RBI का बड़ा फैसला: रेपो रेट 5.25% पर स्थिर, बैंकों के मार्जिन पर बढ़ी चिंता

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AuthorMehul Desai|Published at:
RBI का बड़ा फैसला: रेपो रेट 5.25% पर स्थिर, बैंकों के मार्जिन पर बढ़ी चिंता

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अगस्त 2026 की मॉनेटरी पॉलिसी में रेपो रेट को **5.25%** पर बरकरार रखा है। महंगाई और ग्रोथ को साधने की कोशिश में RBI ने न्यूट्रल रुख बनाए रखा है। वहीं, बैंकों के लिए मुश्किलें खड़ी हो गई हैं क्योंकि लोन पर ब्याज दरें डिपॉजिट पर दी जाने वाली ब्याज दरों से ज़्यादा तेजी से गिर रही हैं, जिससे उनके मुनाफे का मार्जिन (Profit Margin) सिकुड़ रहा है।

RBI का बड़ा फैसला: रेपो रेट स्थिर

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी, जिसकी अगुवाई गवर्नर संजय मल्होत्रा कर रहे हैं, ने 5 अगस्त 2026 को हुई बैठक में पॉलिसी रेपो रेट को 5.25% पर अपरिवर्तित रखने का फैसला किया है। इस फैसले से बेंचमार्क ब्याज दर में कोई बदलाव नहीं हुआ है, क्योंकि केंद्रीय बैंक भारत की मज़बूत आर्थिक ग्रोथ और महंगाई के दबाव के बीच संतुलन बनाने के लिए एक न्यूट्रल (Neutral) रुख अपना रहा है।

हालांकि RBI ने 2027 फाइनेंशियल ईयर के लिए ग्रोथ का अनुमान बढ़ाकर 6.7% कर दिया है, लेकिन वित्तीय क्षेत्र पिछले कुछ समय से ब्याज दरों में की गई कटौती के असर से जूझ रहा है। बैंकों के लिए मुख्य समस्या यह है कि ब्याज दरों का असर हर जगह एक समान नहीं दिख रहा है, जिससे बैंकिंग सिस्टम की लाभप्रदता (Profitability) पर असर पड़ रहा है।

ब्याज दरों के ट्रांसमिशन (Transmission) में अंतर

पिछले साल RBI ने रेपो रेट में काफी कटौती की थी, लेकिन इसके फायदे ग्राहकों और बैंकों तक एक समान नहीं पहुंचे हैं। लोन पर लगने वाली ब्याज दरें, यानी जो दरें बैंकों द्वारा लोन पर चार्ज की जाती हैं, उनमें काफी गिरावट आई है। उदाहरण के तौर पर, नए रुपये के लोन पर वेटेड एवरेज लेंडिंग रेट (Weighted Average Lending Rate) में करीब 80 बेसिस पॉइंट की कमी आई है, जबकि पुराने आउटस्टैंडिंग लोन पर यह कमी लगभग 91 बेसिस पॉइंट रही है।

इसके विपरीत, डिपॉजिट रेट्स, यानी जो दरें बैंक अपने ग्राहकों को देते हैं, उनमें गिरावट धीमी रही है। नए टर्म डिपॉजिट रेट्स में केवल 63 बेसिस पॉइंट की कमी आई है, और पुराने डिपॉजिट्स पर यह नरमी करीब 51 बेसिस पॉइंट रही है। इस देरी का मतलब है कि जहाँ बैंकों को लोन से होने वाली कमाई कम करनी पड़ रही है, वहीं उनके फंड की लागत (Cost of Funds) अपेक्षाकृत ज़्यादा बनी हुई है। इससे उनकी कमाई और खर्च के बीच का अंतर (Gap) कम होता जा रहा है।

प्रॉफिट मार्जिन पर असर

यह ट्रेंड नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) में भी दिखाई दे रहा है, जो किसी बैंक की लाभप्रदता का मुख्य पैमाना है - सीधे शब्दों में कहें तो यह लोन पर कमाए गए ब्याज और डिपॉजिट पर दिए गए ब्याज का अंतर है। 2026 की पहली तिमाही में, टॉप चार प्राइवेट बैंकों में से तीन ने अपने NIM में गिरावट दर्ज की है। हालांकि क्रेडिट की ऊंची मांग ने कुल आय को बनाए रखने में मदद की है, लेकिन मार्जिन में यह सिकुड़न (Compression) एक ऐसा रुझान है जिस पर शेयरधारक बारीकी से नज़र रख रहे हैं।

लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फैसिलिटी (Liquidity Adjustment Facility) के तहत बैंकों के पास प्रतिदिन ₹1.0 लाख करोड़ का सरप्लस लिक्विडिटी है, जिसका मतलब है कि उनके पास पर्याप्त फंड मौजूद है। इससे यह संकेत मिलता है कि डिपॉजिट रेट्स में जल्द बढ़ोतरी की संभावना कम है। हालांकि, भविष्य में ब्याज दरों का रास्ता अभी भी अनिश्चित है। खाद्य पदार्थों, ईंधन की कीमतों और ग्लोबल सप्लाई चेन में रुकावटों से जुड़े महंगाई के जोखिमों को देखते हुए, कुछ अर्थशास्त्री मानते हैं कि साल के अंत से पहले ब्याज दरों में फिर से बढ़ोतरी का एजेंडा वापस आ सकता है।

निवेशकों के लिए, आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बैंक अपनी क्रेडिट ग्रोथ को मार्जिन पर पड़ रहे दबाव के साथ कैसे संतुलित करते हैं। वित्तीय संस्थानों की कम लागत पर फंड जुटाने और एक मज़बूत लोन बुक बनाए रखने की क्षमता, कमाई के प्रदर्शन को निर्धारित करने में एक महत्वपूर्ण कारक होगी। बाज़ार आगामी तिमाही नतीजों में डिपॉजिट प्राइसिंग (Deposit Pricing) और क्रेडिट डिमांड पर बैंकों के मार्गदर्शन पर लगातार नज़र रखेगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.