11 सितंबर, 2026 को भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले लुढ़ककर **95.79** पर पहुंच गया। इस भारी दबाव के बीच RBI ने सरकारी बैंकों के जरिए मार्केट में दखल दिया है, क्योंकि कच्चे तेल की कीमतें **$110** प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं।
शुक्रवार, 11 सितंबर 2026 को भारतीय रुपया भारी दबाव में दिखा और यह 95.79 के स्तर तक गिर गया। बाजार में मची इस अफरा-तफरी को रोकने के लिए Reserve Bank of India (RBI) ने तुरंत मोर्चा संभाला। ट्रेडर्स ने देखा कि सरकारी बैंक डॉलर की बिकवाली कर रहे थे, जो कि रिजर्व बैंक का एक पारंपरिक तरीका है ताकि करेंसी में हो रही तेज गिरावट को थामकर बाजार में स्थिरता लाई जा सके। इसके बाद रुपया थोड़ा संभलकर 95.72 के आसपास ट्रेड करता दिखा।
क्यों दबाव में है रुपया?
रुपए की कमजोरी के पीछे सबसे बड़ी वजह बढ़ती एनर्जी कॉस्ट है। ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की कीमतें $110 प्रति बैरल के करीब बनी हुई हैं। चूंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए क्रूड महंगा होने पर डॉलर की मांग बढ़ जाती है और रुपया कमजोर हो जाता है। साथ ही, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड्स (US Bond Yields) में तेजी के कारण विदेशी निवेशक डॉलर की ओर भाग रहे हैं, जिससे उभरते हुए बाजारों की करेंसीज पर दबाव बढ़ रहा है।
निवेशकों पर क्या होगा असर?
रुपए में इस गिरावट का सीधा असर भारत के इंपोर्ट बिल पर पड़ेगा, जिससे देश में महंगाई बढ़ने का खतरा है। जो कंपनियां कच्चा माल बाहर से मंगाती हैं, जैसे कि ऑयल मार्केटिंग, एविएशन, केमिकल और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर, उनकी इनपुट कॉस्ट बढ़ जाएगी। इससे उनके मुनाफे (Profit Margins) पर सीधा असर पड़ेगा। यदि ये कंपनियां इस बढ़ी हुई लागत को ग्राहकों पर नहीं डाल पाती हैं, तो उनकी अर्निंग्स को चोट पहुंच सकती है।
मार्केट का मूड और आगे की राह
Sensex और Nifty दोनों पर इसका नकारात्मक असर साफ दिख रहा है। महंगी एनर्जी और गिरता रुपया कॉर्पोरेट ग्रोथ के लिए अनिश्चितता पैदा कर रहे हैं। अब निवेशकों की नजरें इस बात पर हैं कि आरबीआई अपने फॉरेन-एक्सचेंज रिजर्व का इस्तेमाल करके करेंसी को कब तक संभाल पाता है। निवेशकों को आने वाले दिनों में ट्रेड डेफिसिट और महंगाई के आंकड़ों पर खास नजर रखनी होगी।
