देश के बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी का संकट गहरा गया है, जहां सरप्लस कैश **₹48,000 करोड़** से लुढ़ककर मात्र **₹541.95 करोड़** पर आ गया है। इस कैश क्रंच को थामने के लिए RBI ने **₹2 लाख करोड़** की लिक्विडिटी इन्फ्यूज की है।
कैश क्रंच का असर
22 अक्टूबर को भारतीय बैंकिंग प्रणाली में लिक्विडिटी का स्तर जून के बाद से अपने सबसे निचले स्तर पर आ गया। कैश की कमी इतनी ज्यादा थी कि बैंकों के बीच रात भर के लिए कर्ज लेने की दर (Call Money Rates) RBI के 5.50% के रेपो बेंचमार्क से ऊपर निकल गई।
क्यों आई नकदी की कमी?
इस अचानक आए कैश क्रंच के पीछे कई बड़े कारण हैं। सबसे प्रमुख वजह टैक्स आउटफ्लो है, जिसके कारण सरकार के पास बड़ी मात्रा में पैसा गया है। इसके अलावा, स्टेट गवर्नमेंट्स के बॉन्ड ऑक्शंस और फेस्टिव सीजन के दौरान आम जनता द्वारा फिजिकल करेंसी की भारी डिमांड ने सिस्टम से नकदी को कम कर दिया है। जब त्योहारों के लिए लोग बैंकों से कैश निकालते हैं, तो सिस्टम में मौजूद लिक्विडिटी पर दबाव बढ़ता है।
RBI का 'डिफेंसिव' दांव
ब्याज दरों में अस्थिरता को रोकने के लिए RBI ने मोर्चा संभाल लिया है। सेंट्रल बैंक ने वेरिएबल रेट रेपो (VRR) ऑक्शंस के जरिए सिस्टम में ₹2 लाख करोड़ की लिक्विडिटी डाली है। इन ऑक्शंस के जरिए RBI बैंकों को शॉर्ट-टर्म के लिए फंड मुहैया कराता है ताकि ओवरनाइट इंटरेस्ट रेट्स तय सीमा में बने रहें।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
निवेशकों को इस स्थिति पर बारीकी से नजर रखने की जरूरत है। जब लिक्विडिटी कम होती है, तो कंपनियों और आम लोगों के लिए लोन लेना महंगा हो सकता है। फिलहाल बाजार इस सीजनल डिमांड के साथ तालमेल बिठा रहा है। आने वाले हफ्तों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकारी खर्च बढ़ने के साथ लिक्विडिटी कितनी तेजी से वापस सिस्टम में लौटती है।
