RBI का ₹1 लाख करोड़ का इंफेक्शन: क्या सिस्टम में कुछ गड़बड़ है?
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने 23 मार्च को एक बड़ा 'ओवरनाइट वेरिएबल रेट रेपो' (VRR) ऑक्शन आयोजित करने की घोषणा की है, जिसके तहत ₹1 लाख करोड़ की लिक्विडिटी बैंकिंग सिस्टम में डाली जाएगी। हैरान करने वाली बात यह है कि यह कदम ऐसे समय उठाया जा रहा है जब सिस्टम में पहले से ही लगभग ₹16,875.36 करोड़ का लिक्विडिटी सरप्लस मौजूद है। यह ऑक्शन सुबह 9:30 से 10:00 बजे के बीच होगा और फंड्स 24 मार्च को वापस होंगे। यह RBI की एक्टिव लिक्विडिटी मैनेजमेंट स्ट्रेटेजी को दिखाता है, जिसका मकसद शॉर्ट-टर्म इंटरेस्ट रेट्स को स्टेबल रखना और फाइनेंशियल सेक्टर के लिए फंड्स का फ्लो बनाए रखना है।
लगातार इंफ्यूजन: क्या है RBI की तैयारी?
यह कोई अकेला कदम नहीं है। इससे पहले भी RBI ने लिक्विडिटी बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए हैं। शुक्रवार को ही ₹25,101 करोड़ का 3-दिन का VRR ऑक्शन हुआ था, और 17 मार्च को ₹48,014 करोड़ का 7-दिन का VRR हुआ था। जनवरी से अब तक, RBI ने 'ओपन मार्केट ऑपरेशन्स' (OMOs) के जरिए ₹3.50 लाख करोड़ की ड्यूरेबल लिक्विडिटी सिस्टम में इंजेक्ट की है।
बैंकिंग सेक्टर की सेहत और मार्जिनल रेट्स
Nifty Bank इंडेक्स, जो भारत के टॉप लेंडर्स को रिप्रेजेंट करता है, फिलहाल ₹53,427 के आस-पास ट्रेड कर रहा है। इसका प्राइस-टू-अर्निंग्स (P/E) रेश्यो करीब 14.3 है, जो न तो बहुत ज्यादा है और न ही बहुत कम। पिछले महीने इंडेक्स में 12% से ज्यादा की गिरावट आई है, हालांकि एक साल के प्रदर्शन को देखें तो इसमें 6.7% से 7.5% तक का उछाल है। RBI के लगातार लिक्विडिटी इंजेक्शन्स का मकसद इस अहम सेक्टर को सपोर्ट करना है, बॉरोइंग कॉस्ट्स को स्टेबल रखना और मॉनेटरी पॉलिसी ट्रांसमिशन को आसान बनाना है। इससे वेटेड एवरेज कॉल रेट (Weighted Average Call Rate) जैसे रेट्स कंट्रोल में रहते हैं, जो पॉलिसी रेपो रेट (5.25%) के मुकाबले 5.07% के आस-पास बना हुआ है। वहीं, 10-साल के इंडियन गवर्नमेंट बॉन्ड यील्ड में हाल के हफ्तों में थोड़ी बढ़ोतरी देखी गई है और यह लगभग 6.73% पर है।
इतनी बड़ी इंफ्यूजन क्यों? विदेशी मुद्रा और महंगाई का दबाव?
RBI की इतनी बड़ी और लगातार लिक्विडिटी डालने की जरूरत पर सवाल उठते हैं, खासकर तब जब सिस्टम में सरप्लस लिक्विडिटी है। यह या तो सिस्टम में किसी छिपे हुए दबाव का संकेत हो सकता है, या फिर RBI भविष्य में आने वाली किसी बड़ी डिमांड के लिए तैयारी कर रहा है। यह बड़ा इंफ्यूजन फॉरेन एक्सचेंज मार्केट में हो रही बिक्री के कारण भी हो सकता है, जिससे रुपये को स्टेबल करने की कोशिश की जा रही है। रुपये पर दबाव के चलते RBI विदेशी मुद्रा बेचता है, जिससे सिस्टम से लिक्विडिटी कम हो जाती है। इस लिक्विडिटी को वापस डालने के लिए RBI यह कदम उठाता है।
इसके अलावा, दुनिया भर में बढ़ती कमोडिटी प्राइसेस, खासकर जियोपॉलिटिकल टेंशन के चलते, भारत में महंगाई (Inflation) का दबाव बढ़ा सकती हैं। मार्च 2026 के लिए होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) का फोरकास्ट 3.2% है। यह बढ़ती महंगाई RBI की पॉलिसी को और जटिल बना सकती है और दरों में बढ़ोतरी की उम्मीदों को हवा दे सकती है।
RBI का रुख और भविष्य की राह
RBI की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) ने फरवरी 2026 की मीटिंग में अपनी मॉनेटरी पॉलिसी को 'न्यूट्रल' बनाए रखा था और रेपो रेट 5.25% पर स्थिर रखा था। RBI ने फाइनेंशियल ईयर 26 के लिए GDP ग्रोथ 7.4% और महंगाई 2.1% रहने का अनुमान जताया है। यह लिक्विडिटी ऑपरेशन्स RBI की स्ट्रेटेजी का अहम हिस्सा हैं, जो आर्थिक स्थितियों को मैनेज करने, फाइनेंशियल स्टेबिलिटी बनाए रखने और क्रेडिट फ्लो को सपोर्ट करने में मदद करते हैं, खासकर विदेशी बाजारों की अस्थिरता और महंगाई के दबाव के बीच।
