RBI ने बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी की कमी को दूर करने के लिए **₹1 लाख करोड़** का भारी-भरकम फंड इंजेक्ट किया है। 7-दिन के रेपो ऑक्शन के जरिए हुई यह कार्रवाई 3 महीने में पहली बार हुई है, ताकि टैक्स पेमेंट के कारण बाजार पर बढ़ रहे दबाव को कम किया जा सके।
बाजार की जरूरत और RBI का कदम
टैक्स आउटफ्लो के कारण बाजार में नकदी (Cash) का संकट गहरा गया था, जिसके चलते RBI को ₹1 लाख करोड़ के लिक्विडिटी इंजेक्शन का फैसला लेना पड़ा। 7-दिवसीय वेरिएबल रेट रेपो ऑक्शन के लिए बैंकों ने ₹1.5 लाख करोड़ से ज्यादा की बोली लगाई, जिससे साफ है कि बाजार में फंड्स की मांग कितनी ज्यादा है। यह पिछले 3 महीनों में केंद्रीय बैंक का पहला ऐसा कदम है, जो संकेत देता है कि अब RBI अतिरिक्त फंड सोखने के बजाय लिक्विडिटी मैनेजमेंट पर ध्यान दे रहा है।
क्यों बढ़ी घबराहट?
अक्टूबर के दौरान बैंकों के बीच शॉर्ट-टर्म उधार लेने की लागत में लगातार उछाल देखा गया। स्थिति इतनी टाइट हो गई थी कि इंटरबैंक कॉल मनी रेट, मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी (MSF) रेट यानी 5.75% के स्तर को भी पार कर गया। जब बैंक आपस में इतने महंगे रेट पर पैसा उधार ले रहे हों, तो यह सीधे तौर पर लिक्विडिटी की भारी कमी को दर्शाता है।
डेटा क्या कहता है?
16 अक्टूबर तक सिस्टम में कुल लिक्विडिटी सरप्लस घटकर ₹2 लाख करोड़ से नीचे आ गया था, जो कुल डिपॉजिट का करीब 0.7% है। रेपो रेट 5.50% पर स्थिर होने के बावजूद मार्केट रेट्स 5.75% के ऊपरी स्तर को छू रहे थे।
निवेशकों के लिए सबक
अब RBI का रुख बदल रहा है। अब बड़े बदलावों के बजाय केंद्रीय बैंक शॉर्ट-टर्म ऑक्शन के जरिए मार्केट की अस्थिरता को कंट्रोल करने पर जोर दे रहा है। आने वाले दिनों में इंटरबैंक इंटरेस्ट रेट्स पर नजर रखना जरूरी है, ताकि यह समझा जा सके कि क्या इस ₹1 लाख करोड़ के इंजेक्शन से बाजार में शांति लौटती है या नहीं।
