RBI ने रेपो रेट में **25 बेसिस पॉइंट्स** का इजाफा करते हुए इसे **5.50%** कर दिया है। साथ ही, केंद्रीय बैंक ने अपने रुख को बदलकर 'कैलिब्रेटेड टाइटनिंग' (Calibrated Tightening) कर दिया है, जिससे निवेशकों की चिंता बढ़ गई है।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बड़ा कदम उठाते हुए रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी की है, जिसके बाद यह दर 5.50% पर पहुंच गई है। एमपीसी (MPC) सदस्य सौगत भट्टाचार्य के मुताबिक, यह बदलाव न केवल घरेलू महंगाई को काबू में रखने के लिए है, बल्कि ग्लोबल मार्केट में G7 देशों के साथ ब्याज दरों के अंतर को बनाए रखने के लिए भी जरूरी है, ताकि विदेशी पूंजी का प्रवाह बना रहे।
निवेशकों और कॉर्पोरेट जगत पर असर
इस फैसले का सीधा असर कॉर्पोरेट इंडिया की जेब पर पड़ेगा। जब रेपो रेट बढ़ता है, तो बैंकों के लिए फंड जुटाना महंगा हो जाता है, जिसका सीधा ट्रांसफर ग्राहकों और बिजनेस लोन की बढ़ी हुई ब्याज दरों के रूप में होता है। जिन कंपनियों पर कर्ज का भारी बोझ है, उनके इंटरेस्ट खर्च बढ़ेंगे, जो सीधे उनके नेट प्रॉफिट मार्जिन को प्रभावित कर सकते हैं। इसके अलावा, ऊंची ब्याज दरें आमतौर पर इक्विटी वैल्यूएशन पर दबाव डालती हैं।
महंगाई और आगे की राह
मौजूदा समय में होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) 9% के आसपास बना हुआ है, जो यह दर्शाता है कि महंगाई काफी गहराई तक पैठ चुकी है। भट्टाचार्य ने स्पष्ट किया कि अब तक की पॉलिसी काफी 'अकोमोडेटिव' रही थी, लेकिन अब स्थिरता के लिए सख्ती जरूरी है। हालांकि, RBI ने 'कैलिब्रेटेड' तरीका अपनाया है ताकि आर्थिक विकास की रफ्तार एकदम से न थमे। भविष्य के फैसले पूरी तरह से आने वाले आर्थिक डेटा और ग्लोबल अस्थिरता पर निर्भर करेंगे, इसलिए निवेशकों को RBI की अगली मीटिंग पर पैनी नजर रखनी होगी।
