Reserve Bank of India ने अपनी मौद्रिक नीति में बदलाव करते हुए Repo Rate में **25 basis points** की बढ़ोतरी की है। अब नई दर **5.50%** हो गई है। केंद्रीय बैंक ने इसे 'कैलिब्रेटेड टाइटनिंग' (calibrated tightening) करार दिया है, जिससे आने वाले समय में लोन महंगे होने के संकेत हैं।
बैंकिंग लिक्विडिटी में आया बड़ा बदलाव
ब्याज दरों में इस बढ़ोतरी से पहले भी बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी मैनेजमेंट को लेकर बदलाव दिख रहे थे। चालू फाइनेंशियल ईयर की पहली छमाही (अप्रैल से सितंबर 2026) के डेटा के मुताबिक, पब्लिक सेक्टर बैंकों (PSBs) की हिस्सेदारी कोलैटरलाइज्ड ओवरनाइट मार्केट में 32% से बढ़कर 35% हो गई है।\n\nवहीं, दूसरी ओर प्राइवेट सेक्टर के बैंकों ने ट्राई-पार्टी रेपो मार्केट पर अपनी निर्भरता काफी कम कर दी है। इन बैंकों की इस मार्केट में हिस्सेदारी 24% से गिरकर 14% रह गई है, जो बैंकों के बीच बदलते रिस्क मैनेजमेंट को दिखाता है।\n\n### क्यों अहम है कोलैटरलाइज्ड फंडिंग?
आज के दौर में ओवरनाइट मनी मार्केट में 97% वॉल्यूम कोलैटरलाइज्ड इंस्ट्रूमेंट्स से आ रहा है। चूंकि बैंक सरकारी सिक्योरिटीज़ या अन्य एसेट्स को गिरवी रखकर कर्ज लेते हैं, इसलिए इसे सुरक्षित माना जाता है। वहीं, अन-कोलैटरलाइज्ड मार्केट का हिस्सा महज 3% है, जो यह बताता है कि बैंक फिलहाल रिस्क लेने के बजाय सुरक्षा को प्राथमिकता दे रहे हैं।\n\n### निवेशकों पर क्या होगा असर?
रेपो रेट के 5.50% होने का सीधा असर आपकी जेब पर पड़ेगा। होम, ऑटो और पर्सनल लोन की ईएमआई (EMI) में बढ़ोतरी तय मानी जा रही है। बैंकों के नजरिए से देखें, तो हालांकि लंबे समय में नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) में फायदा हो सकता है, लेकिन शॉर्ट टर्म में बॉन्ड पोर्टफोलियो में मार्क-टू-मार्केट नुकसान और डिपॉजिट कॉस्ट बढ़ने का दबाव रहेगा।\n\nरियल एस्टेट और कंज्यूमर गुड्स जैसे सेक्टर्स के लिए यह खबर चुनौतीपूर्ण हो सकती है क्योंकि ऊंची ब्याज दरें मांग को प्रभावित कर सकती हैं। अब देखना यह होगा कि बैंक कितनी तेजी से बढ़ी हुई लागत को ग्राहकों तक पहुंचाते हैं और इसका लोन की मांग पर कितना असर पड़ता है।
