भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने संकेत दिया है कि केंद्रीय बैंक आर्थिक विस्तार को समर्थन देने के लिए महंगाई में अस्थायी उछाल और ऊंचे क्रेडिट ग्रोथ को नज़रअंदाज़ कर सकता है। RBI फिलहाल महंगाई को मांग के बजाय सप्लाई की समस्या मान रहा है, जिससे लगता है कि मॉनेटरी पॉलिसी में फिलहाल स्थिरता बनी रहेगी।
ग्रोथ को प्राथमिकता, महंगाई को 'अस्थायी'
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अर्थव्यवस्था की रफ़्तार बनाए रखने को अब तात्कालिक नीतिगत सख्ती से ज़्यादा अहमियत दे रहा है। गवर्नर संजय मल्होत्रा ने हाल ही में कहा कि केंद्रीय बैंक फिलहाल महंगाई के मौजूदा स्तरों से सहज है। उनका मानना है कि कीमतों में बढ़ोतरी सप्लाई-साइड की अस्थायी दिक्कतों का नतीजा है, न कि अर्थव्यवस्था के ज़्यादा गरम होने का।
5.1% महंगाई पर भी नरमी?
हालांकि, मौजूदा उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) लगभग 5.1% रहने का अनुमान है, जो RBI के तय लक्ष्य से थोड़ा ज़्यादा है। इसके बावजूद, गवर्नर ने ज़ोर देकर कहा कि नीतिगत फैसले सिर्फ़ इस आंकड़े पर निर्भर नहीं करेंगे। RBI अब महंगाई के कारणों का ज़्यादा गहराई से विश्लेषण कर रहा है, ताकि उन खास सेक्टरों की पहचान की जा सके जहां कीमतें बढ़ रही हैं। इस 'ग्रैनुलर' अप्रोच का मकसद ऐसी ब्याज दरें बढ़ाने से बचना है जो घरेलू निवेश और खपत को धीमा कर सकती हैं।
क्रेडिट ग्रोथ पर पैनी नज़र
भारत में फिलहाल क्रेडिट ग्रोथ लगभग 18% की रफ़्तार से बढ़ रही है, जो बताता है कि बिज़नेस और आम लोग जमकर कर्ज़ ले रहे हैं। इनमें माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज (MSMEs) और गोल्ड-लोन सेगमेंट में तो ग्रोथ 24-25% की तेज़ रफ़्तार से हो रही है। RBI इन क्षेत्रों पर कड़ी नज़र बनाए हुए है। इसका मक़सद यह सुनिश्चित करना है कि यह क्रेडिट बूम स्वस्थ रहे और कहीं NPA (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स) का बोझ न बढ़े, जो अतीत में कई क्रेडिट साइकल में एक बड़ी चुनौती रहा है।
निवेशकों के लिए क्या है मायने?
RBI के इस रुख से निवेशकों को आने वाले समय में उधारी की लागत में स्थिरता देखने को मिल सकती है। जब केंद्रीय बैंक ग्रोथ को प्राथमिकता देता है, तो कंपनियों के लिए अपने विस्तार की योजनाओं के लिए कर्ज़ लेना आसान हो जाता है। हालांकि, यह रणनीति इस बात पर निर्भर करती है कि महंगाई व्यापक या लगातार न बने। अगर सप्लाई की समस्या उम्मीद से ज़्यादा लंबी खिंचती है या ग्लोबल कमोडिटी की कीमतों में बड़ा बदलाव आता है, तो RBI को अपनी रणनीति बदलनी पड़ सकती है।
भविष्य में, बाज़ार RBI की अगली पॉलिसी रिव्यू मीटिंग का इंतज़ार करेगा, ताकि यह देखा जा सके कि क्रेडिट क्वालिटी को लेकर उसके रुख में कोई बदलाव आता है या नहीं। खासकर MSME और गोल्ड लोन पोर्टफोलियो में हो रही तेज़ ग्रोथ के टिकाऊ रहने या नियामक की तरफ से इन सेगमेंट में अत्यधिक जोखिम को कम करने के लिए नए उपायों पर खास ध्यान दिया जाएगा। इन तेज़ी से बढ़ रहे क्रेडिट क्षेत्रों पर केंद्रीय बैंक का स्पष्ट संचार वित्तीय संस्थानों और निवेशकों के लिए संभावित नियामक जोखिमों का अंदाज़ा लगाने में महत्वपूर्ण होगा।
