RBI गवर्नर का बड़ा बचाव! FCNR(B) स्वैप विंडो जल्दी बंद करने पर दी सफाई, जानें क्या है वजह

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AuthorNeha Patil|Published at:
RBI गवर्नर का बड़ा बचाव! FCNR(B) स्वैप विंडो जल्दी बंद करने पर दी सफाई, जानें क्या है वजह

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने FCNR(B) स्वैप विंडो को 31 अगस्त तक बंद करने के फैसले का बचाव किया है। उनका कहना है कि यह मजबूत फॉरेक्स इनफ्लो को देखते हुए उठाया गया एक रणनीतिक कदम है। इस फैसले से भारत के फॉरेक्स रिजर्व में $56 अरब से ज्यादा की राशि आई है, लेकिन बैंकों में अनिश्चितता और पॉलिसी में बदलाव को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

FCNR(B) स्वैप विंडो को लेकर RBI गवर्नर की सफाई

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने हाल ही में फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट (FCNR(B)) डिपॉजिट स्वैप विंडो को जल्दी बंद करने के फैसले पर अपनी बात रखी है। पहले यह विंडो 30 सितंबर, 2026 को बंद होनी थी, लेकिन अब इसे बढ़ाकर 31 अगस्त, 2026 कर दिया गया है। गवर्नर मल्होत्रा ने इस कदम को डेटा-संचालित और मजबूती की स्थिति से लिया गया एक समझदारी भरा कदम बताया। उन्होंने कहा कि इस स्कीम के मुख्य लक्ष्य काफी हद तक पूरे हो चुके हैं।

क्या है FCNR(B) स्वैप फैसिलिटी?

FCNR(B) स्वैप फैसिलिटी एक ऐसा जरिया है जिसके ज़रिए बैंक विदेशी मुद्रा डिपॉजिट ला सकते हैं और उन्हें RBI के साथ रुपये में बदल सकते हैं। इससे बैंकों को अपनी लिक्विडिटी मैनेज करने में मदद मिलती है और देश के विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ावा मिलता है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 13 अगस्त तक तीन विशेष फॉरेक्स स्कीमों से कुल $56.85 अरब का इनफ्लो हुआ है, जिसमें से $52.3 अरब FCNR(B) डिपॉजिट के जरिए आए हैं।

पॉलिसी में अचानक बदलाव से क्यों मची खलबली?

जहां RBI का कहना है कि यह फॉरेक्स रिजर्व को मैनेज करने के लिए एक रणनीतिक कदम है, वहीं इस फैसले ने सबको चौंका दिया है। सिर्फ 5 अगस्त को ही RBI ने कहा था कि विंडो को जल्दी बंद करने की कोई योजना नहीं है। लेकिन नौ दिन बाद अचानक समय-सीमा बदलने से कई बैंक और मार्केट पार्टिसिपेंट्स हैरान रह गए। इस अचानक घोषणा के कारण 18 अगस्त को HDFC Bank, ICICI Bank और State Bank of India जैसे बैंकिंग शेयरों पर दबाव देखा गया, क्योंकि निवेशकों ने इस बदलाव पर प्रतिक्रिया दी।

बैंकों और निवेशकों के लिए क्या हैं चिंताएं?

इस फैसले से बैंकिंग सेक्टर के सामने कई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। पहला, बैंकों के लिए रुपया लिक्विडिटी और सरकारी सिक्योरिटीज की मांग को मैनेज करने का एक जरिया खत्म हो गया है। दूसरा, 31 अगस्त की समय-सीमा से पहले बैंकों को अपने सारे इंतजाम पूरे करने होंगे, जिससे ऑपरेशनल अनिश्चितता बढ़ गई है। इसके अलावा, तीन से पांच साल में जब ये डिपॉजिट मैच्योर होंगे, तब बैंकों को RBI के सपोर्ट के बिना रीफाइनेंसिंग प्रोसेस मैनेज करनी होगी, जो एक लंबी अवधि की चिंता है।

निवेशकों के लिए, तत्काल लिक्विडिटी के प्रभाव से ज्यादा पॉलिसी की अनुमानितता (Predictability) एक बड़ा सवाल है। जब सेंट्रल बैंक का गाइडेंस इतनी जल्दी बदलता है, तो वित्तीय संस्थानों के लिए अपनी फंडिंग स्ट्रेटेजी की योजना बनाना मुश्किल हो जाता है। हालांकि, RBI के इस कदम से भारत के बाहरी बफ़र्स और बैलेंस ऑफ पेमेंट्स को निश्चित रूप से मजबूती मिली है, लेकिन मार्केट एनालिस्ट्स अब यह देखने का इंतजार कर रहे हैं कि आने वाले महीनों में इसका बैंकिंग लिक्विडिटी पर क्या असर पड़ता है। एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग्स (ECB) जैसी अन्य स्कीमों के लिए स्वैप विंडो 31 दिसंबर तक खुली है, और मार्केट संभवतः RBI से उस सुविधा के संबंध में किसी भी और अपडेट पर नज़र रखेगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.