RBI के नए आंकड़ों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में बैंकों की फ्रेश डिपॉजिट कॉस्ट **40 बेसिस पॉइंट्स** कम हुई है। हालांकि, जुलाई और अगस्त के बीच नए लोन की ब्याज दरें **8 बेसिस पॉइंट्स** बढ़ गई हैं। यह बढ़ता अंतर बैंकिंग शेयरों के मुनाफे पर असर डाल सकता है, जिस पर निवेशकों की पैनी नजर है।
डिपॉजिट कॉस्ट क्यों घटी?
RBI के अक्टूबर बुलेटिन के मुताबिक, बैंकों की फंड जुटाने की लागत में बदलाव आया है। पहली छमाही में नए फिक्स्ड डिपॉजिट पर ब्याज दरों में 0.40% की कमी आई है। इस गिरावट के पीछे मुख्य वजह Foreign Currency Non-Resident Bank (FCNR-B) डिपॉजिट में आया उछाल है। जून में सेंट्रल बैंक द्वारा पेश की गई फॉरेन करेंसी स्वैप फैसिलिटी के चलते बैंकों को सस्ते विदेशी फंड मिले, जिससे उन्हें महंगे घरेलू डिपॉजिट पर निर्भरता कम करने में मदद मिली।
लोन की दरों में अंतर
डिपॉजिट सस्ते होने के बावजूद कर्जदारों को इसका फायदा नहीं मिल रहा है। जुलाई से अगस्त के बीच नए रुपी लोन की ब्याज दरों में 8 बेसिस पॉइंट्स की बढ़त देखी गई। इसका मतलब है कि 'मॉनेटरी ट्रांसमिशन' (Monetary Transmission) अभी भी सुस्त है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि बैंकों के पास अभी भी पुराने हाई-कॉस्ट टर्म डिपॉजिट मौजूद हैं, जिनके मैच्योर होने तक बैंक कर्ज सस्ता करने में सावधानी बरत रहे हैं। इसके अलावा, बैंक अपने नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) को सुरक्षित रखने की कोशिश कर रहे हैं।
निवेशकों के लिए चेतावनी
बैंकिंग सेक्टर के निवेशकों के लिए यह स्थिति महत्वपूर्ण है। यदि डिपॉजिट कॉस्ट कम रहती है, तो आने वाली तिमाहियों में बैंकों के मार्जिन में सुधार दिख सकता है, बशर्ते लोन ग्रोथ बनी रहे। लेकिन, अगर लोन की दरें लंबे समय तक ऊंची बनी रहीं, तो क्रेडिट डिमांड में कमी आ सकती है। निवेशकों को आने वाली तिमाही के नतीजों में नेट इंटरेस्ट मार्जिन और मैनेजमेंट कमेंट्री पर खास ध्यान देने की जरूरत है।
