Reserve Bank of India (RBI) रुपये की चाल को स्थिर रखने के लिए 'टू-साइडेड' रणनीति अपना रहा है। इसका मकसद किसी फिक्स्ड रेट को बचाना नहीं, बल्कि बाजार में होने वाली घबराहट और अनिश्चितता को कम करना है।
RBI इन दिनों निवेशकों और मार्केट एक्सपर्ट्स के बीच चर्चा का केंद्र बना हुआ है। सवाल यह है कि क्या सेंट्रल बैंक रुपये की किसी खास कीमत को डिफेंड कर रहा है या फिर केवल बाजार की अस्थिरता को संभाल रहा है? डेटा इशारा करता है कि RBI विदेशी मुद्रा बाजार में लिक्विडिटी के झटकों को सोखने के लिए सक्रिय है ताकि करेंसी में अनियंत्रित उतार-चढ़ाव न हो।
अगस्त का डेटा और RBI का दखल
अगस्त में RBI का इंटरवेंशन काफी आक्रामक था। उस दौरान बैंक ने $74.47 अरब की डॉलर खरीदारी की, जबकि $31.21 अरब की बिकवाली हुई। यह भारी वॉल्यूम FCNR (Foreign Currency Non-Resident) डिपॉजिट्स से आए डॉलर इनफ्लो की वजह से था। इन inflows को सोखकर RBI ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत किया और रुपये को 95.00 से 95.35 के दायरे में रखा।
सितंबर से बदली तस्वीर
सितंबर के बाद से स्थितियां बदली हैं। विदेशी मुद्रा भंडार में करीब $56 अरब की कमी आई है। मार्केट डेटा बताता है कि रुपये को 97 के मनोवैज्ञानिक स्तर के नीचे जाने से रोकने के लिए RBI ने करीब $60 अरब से ज्यादा के डॉलर बाजार में बेचे हैं। अक्टूबर की शुरुआत में जब रुपया 96.80 के करीब पहुंचा, तो RBI के हस्तक्षेप ने सट्टा ट्रेडिंग पर लगाम लगाकर इसे स्थिर किया।
निवेशकों पर क्या होगा असर?
रुपये में अस्थिरता से उन कंपनियों को दिक्कत होती है जो इंपोर्ट पर निर्भर हैं, जैसे ऑयल और इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियां, क्योंकि कमजोर रुपया उनकी लागत बढ़ा देता है। दूसरी ओर, IT और फार्मा जैसे एक्सपोर्ट ओरिएंटेड सेक्टर्स को फायदा होता है। हालांकि, बहुत ज्यादा वोलेटिलिटी FII (Foreign Institutional Investors) को डराती है, जो भारतीय बाजार में निवेश के लिए स्थिरता की उम्मीद रखते हैं।
आगे की राह में निवेशकों को विदेशी मुद्रा भंडार के साप्ताहिक डेटा पर नजर रखनी चाहिए। इसके साथ ही ग्लोबल क्रूड ऑयल की कीमतें और US Federal Reserve के ब्याज दरों पर लिए जाने वाले फैसले, तय करेंगे कि RBI आने वाले महीनों में रुपये को कैसे मैनेज करता है।
