RBI की मॉनेटरी पॉलिसी के सामने क्लाइमेट चेंज की चुनौती, महंगाई और ग्रोथ के बीच फंसी रिजर्व बैंक

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
RBI की मॉनेटरी पॉलिसी के सामने क्लाइमेट चेंज की चुनौती, महंगाई और ग्रोथ के बीच फंसी रिजर्व बैंक

मौसम का बिगड़ता मिजाज Reserve Bank of India के लिए बड़ी मुसीबत बन गया है। बेमौसम बारिश और तापमान में उतार-चढ़ाव के कारण फूड इन्फ्लेशन तेजी से बढ़ रही है, जिससे RBI के लिए महंगाई को काबू में रखना और रूरल इकोनॉमी को सहारा देना एक मुश्किल चुनौती बन गया है।

सप्लाई-साइड इन्फ्लेशन का संकट

आमतौर पर सेंट्रल बैंक ब्याज दरों (Interest Rates) में बदलाव करके डिमांड को कंट्रोल करते हैं, लेकिन मौसम की मार से पैदा हुई 'सप्लाई-साइड' महंगाई पर ये टूल्स कम असरदार साबित हो रहे हैं। अगर सूखे या गर्मी के कारण फसलों का उत्पादन गिरता है, तो ब्याज दरें बढ़ाकर सब्जियों या अनाज की सप्लाई को नहीं बढ़ाया जा सकता। इससे RBI के सामने यह कठिन फैसला लेना है कि लिक्विडिटी को कम करके महंगाई रोकी जाए या फिर रूरल सेक्टर को राहत दी जाए।

रूरल इकोनॉमी पर सीधा असर

कृषि उत्पादकता में कमी का सीधा असर किसानों की कमाई पर पड़ रहा है। इससे उनकी परचेजिंग पावर घटी है और एफएमसीजी (FMCG) जैसी कंपनियों की बिक्री में भी गिरावट देखी जा रही है। अगर RBI लंबे समय तक ऊंची ब्याज दरें बनाए रखता है, तो रूरल कंजम्पशन और सुस्त पड़ सकता है, जो भविष्य में ग्रोथ के लिए बड़ा जोखिम है।

वित्तीय नियमों में बदलाव की आहट

क्लाइमेट रिस्क अब केवल प्राइस स्टेबिलिटी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह फाइनेंशियल रेगुलेशन का हिस्सा बन रहा है। RBI अब बैंकों और लेंडर्स को इस बात के लिए प्रोत्साहित कर रहा है कि वे कर्ज देते समय क्लाइमेट रिस्क को भी अपनी फ्रेमवर्क में शामिल करें। इसका मतलब है कि भविष्य में उन उधारकर्ताओं को लोन मिलना मुश्किल हो सकता है जो बाढ़ या सूखे जैसे पर्यावरणीय खतरों के प्रति ज्यादा संवेदनशील हैं।

मार्केट की नजर अब इस पर है कि आने वाली मॉनेटरी पॉलिसी बैठकों में RBI महंगाई को लेकर क्या रुख अपनाता है और रूरल इकोनॉमी की सेहत को लेकर क्या आकलन पेश करता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.