RBI की FCNR(B) स्वैप योजना ने **$132.98 अरब** का विदेशी फंड जुटाकर रुपये को तो संभाल लिया है, लेकिन अब बढ़ती ब्याज लागत और लिक्विडिटी मैनेज करने का खर्च सेंट्रल बैंक के लिए नई चुनौती बन गया है। निवेशकों की नजर अब **2029-2031** के मैच्योरिटी वॉल पर है, जो फॉरेक्स रिजर्व के लिए एक बड़ा टेस्ट साबित हो सकता है।
चुनौती क्या है?
RBI ने रुपये को गिरने से बचाने के लिए FCNR(B) स्वैप का जो रास्ता अपनाया था, वह अब एक जटिल फाइनेंशियल पहेली बन गया है। इस प्रोग्राम के जरिए $132.98 अरब का भारी फंड आया, जिसने मार्केट में स्थिरता तो दी, लेकिन अब इसके 'हिडन कॉस्ट' सामने आने लगे हैं। सबसे बड़ी समस्या 'इंटरेस्ट रेट गैप' है। RBI इन डिपॉजिट्स पर 6% से 7.5% का ब्याज दे रहा है, जबकि उन डॉलर एसेट्स से कमाई मात्र 4% के करीब है। यह ब्याज का अंतर सीधे तौर पर RBI के सालाना सरप्लस पर असर डाल रहा है, जो सरकार को डिविडेंड के रूप में मिलता है।
लिक्विडिटी मैनेज करने का खर्च
इस स्वैप मैकेनिज्म ने बैंकिंग सिस्टम में ₹11 लाख करोड़ से ज्यादा की लिक्विडिटी छोड़ दी। महंगाई को काबू में रखने के लिए RBI को इसे सोखने (Absorb) के लिए वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो और स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी जैसे महंगे हथकंडे अपनाने पड़ रहे हैं। अनुमान है कि केवल इन लिक्विडिटी ऑपरेशंस का सालाना ब्याज बोझ ₹35,100 करोड़ के पार चला गया है।
आगे का जोखिम: मैच्योरिटी वॉल
अब चिंता 2029 और 2031 को लेकर है। भारत का एक्सटर्नल डेट जीडीपी के 25% के करीब पहुंच रहा है। जैसे-जैसे ये डिपॉजिट मैच्योर होंगे, ये लॉन्ग-टर्म लायबिलिटी से शॉर्ट-टर्म में बदल जाएंगे। अगर ग्लोबल मार्केट में हालात टाइट हुए, तो यह फॉरेक्स रिजर्व के लिए एक बड़ी परीक्षा होगी। निवेशकों को यह देखना होगा कि RBI बिना लिक्विडिटी को बाधित किए इन भारी-भरकम पेमेंट्स को कैसे मैनेज करता है।
