Indian Rupee लगातार दबाव में है, जिसकी मुख्य वजह एनर्जी इम्पोर्ट कॉस्ट और विदेशी निवेश में कमी है। अब बाजार की नजर इस पर है कि क्या RBI ब्याज दरों में बढ़ोतरी या टैक्स में बदलाव जैसे बड़े कदम उठाएगा।
भारतीय रुपया इन दिनों काफी उतार-चढ़ाव भरे दौर से गुजर रहा है। विदेशी निवेशकों की तरफ से लगातार $30 बिलियन से ज्यादा की निकासी और ऊंचे एनर्जी इम्पोर्ट बिल ने करेंसी पर भारी दबाव बना रखा है। हालांकि RBI बाजार में दखल देकर रुपये को संभालने की कोशिश कर रहा है, लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि अब स्ट्रक्चरल सुधारों की जरूरत है।
क्या और आक्रामक होगी मॉनेटरी पॉलिसी?
RBI पहले ही ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर चुका है, लेकिन कई एनालिस्ट्स का कहना है कि आर्थिक असंतुलन को दूर करने के लिए और सख्त कदम उठाने होंगे। MUFG Bank Ltd. के मुताबिक, भारत और अमेरिका के बीच यील्ड गैप (Yield Gap) को कम करना बेहद जरूरी है ताकि भारतीय एसेट्स विदेशी निवेशकों के लिए आकर्षक बने रहें।
लिक्विडिटी कंट्रोल के लिए नए टूल्स
जानकारों की नजर अब RBI के लिक्विडिटी मैनेजमेंट पर है। एक विकल्प यह है कि 'मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी' (MSF) और रेपो रेट के बीच के अंतर (Spread) को बढ़ाया जाए। इससे शॉर्ट-टर्म उधार लेना महंगा हो जाएगा, जिससे सट्टेबाजों के लिए रुपये के खिलाफ ट्रेड करना मुश्किल हो जाएगा।
टैक्स और फ्यूल का गणित
IIFL Capital के जानकारों का मानना है कि इक्विटी पर 'लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स' में बदलाव विदेशी निवेशकों का भरोसा वापस लाने में मदद कर सकता है। वहीं, Nomura के इकोनॉमिस्ट्स का तर्क है कि अगर पेट्रोल और डीजल की कीमतें ग्लोबल मार्केट के अनुसार तय की जाएं, तो तेल की मांग कम होगी। इससे डॉलर की डिमांड घटेगी और रुपये को एक स्ट्रक्चरल मजबूती मिलेगी।
अब बाजार को बस इस बात का इंतजार है कि सरकार और RBI मिलकर कौन सा कड़ा फैसला लेते हैं, जिससे मार्केट में फिर से स्थिरता लौट सके।
