रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (DIIs) के लिए नियमों को सरल बना दिया है। अब म्यूचुअल फंड, इंश्योरेंस कंपनियां और पेंशन फंड्स को प्राइवेट बैंकों में **10%** तक की हिस्सेदारी के लिए केवल एक बार अप्रूवल लेना होगा।
क्या बदला है नियमों में?
RBI ने 1 अक्टूबर, 2026 से प्राइवेट सेक्टर बैंकों में इक्विटी ओनरशिप से जुड़े नियमों में बड़ा बदलाव किया है। पहले 5% से ज्यादा हिस्सेदारी होने पर हर बार एडिशनल खरीदारी के लिए सेंट्रल बैंक से इजाजत लेनी पड़ती थी, जिससे पोर्टफोलियो मैनेज करने में काफी कागजी काम बढ़ जाता था। अब इस झंझट को खत्म करते हुए वन-टाइम अप्रूवल की सुविधा दी गई है।
कैसे काम करेगा यह सिस्टम?
इन्वेस्टर्स को इसके लिए RBI के PRAVAAH पोर्टल के जरिए आवेदन करना होगा। यह सुविधा सिर्फ उन रेगुलेटेड संस्थाओं के लिए है जो बैंक के प्रमोटर ग्रुप का हिस्सा नहीं हैं। हालांकि, 5% का थ्रेशोल्ड अभी भी महत्वपूर्ण है। यानी किसी भी बैंक में 5% या उससे ज्यादा की शुरुआती हिस्सेदारी खरीदने के लिए पहले की तरह ही मंजूरी लेनी होगी, लेकिन उसके बाद 10% तक की लिमिट तक पहुंचने के लिए बार-बार चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे।
बाजार पर क्या होगा असर?
जानकारों का मानना है कि इस कदम से प्राइवेट बैंकिंग शेयरों में लिक्विडिटी बढ़ेगी। जब इंस्टीट्यूशनल प्लेयर्स को बार-बार रेगुलेटरी बाधाओं का सामना नहीं करना पड़ेगा, तो वे अपनी होल्डिंग्स को और ज्यादा बेहतर तरीके से मैनेज कर पाएंगे। हालांकि, पारदर्शिता बनाए रखने के लिए यह अनिवार्य होगा कि 5% से ऊपर हिस्सेदारी बदलने पर बैंक और रेगुलेटर को 3 वर्किंग दिनों के भीतर जानकारी दी जाए।
RBI ने अपनी निगरानी भी जारी रखी है। यदि कोई इन्वेस्टर रेगुलेटर के 'फिट एंड प्रॉपर' क्राइटेरिया पर खरा नहीं उतरता है, तो RBI के पास दी गई वन-टाइम अप्रूवल को रद्द करने का पूरा अधिकार होगा।
