RBI ने बैंकिंग सिस्टम से करीब $20 अरब की अतिरिक्त लिक्विडिटी को सोख लिया है। बॉन्ड सेल और करेंसी स्वैप जैसे टूल्स के जरिए की गई इस कार्रवाई का मकसद सिस्टम में नकदी को कंट्रोल करना है। निवेशकों के लिए इसका मतलब है कि आने वाले समय में कंपनियों के लिए कर्ज लेना महंगा हो सकता है।
सिस्टम से नकदी खींचने की तैयारी\n\nभारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकिंग सेक्टर से लगभग $20 अरब की अतिरिक्त नकदी (Liquidity) को सिस्टम से बाहर निकाल दिया है। इसके लिए सेंट्रल बैंक ने बॉन्ड सेल और फॉरेन एक्सचेंज स्वैप का सहारा लिया है। गौर करने वाली बात यह है कि इस महीने की शुरुआत में बैंकिंग सिस्टम का सरप्लस ₹11 लाख करोड़ के पार पहुंच गया था।\n\n### महंगाई पर लगाम की कोशिश\n\nसिस्टम में बहुत ज्यादा नकदी होने से महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है। RBI इस नकदी को खींचकर इकॉनमी को स्टेबल रखना चाहता है। यह कदम 'आसान नकदी' के दौर से हटकर एक सख्त फाइनेंशियल वातावरण की ओर इशारा करता है।\n\n### निवेशकों के लिए चेतावनी\n\nलिक्विडिटी टाइट होने का सीधा मतलब है कि बैंकों के पास उधार देने के लिए पैसा कम होगा, जिससे कंपनियों और आम लोगों के लिए लोन महंगा हो सकता है। जिन कंपनियों पर कर्ज का बोझ ज्यादा है, उनके प्रॉफिट मार्जिन पर इसका सीधा असर पड़ सकता है।\n\n### डॉलर-रुपया स्वैप और हेजिंग कॉस्ट\n\nRBI इस बार डॉलर-रुपया सेल-बाय स्वैप और डायरेक्ट बॉन्ड सेल का इस्तेमाल कर रहा है। इसका असर यह हुआ है कि डॉलर-रुपया फॉरवर्ड प्रीमियम में इस महीने करीब 50 बेसिस पॉइंट्स का उछाल आया है। यानी जो कंपनियां फॉरेन करेंसी का काम करती हैं, उनके लिए हेजिंग करना अब और महंगा हो गया है।\n\n### CRR हाइक से बचाव\n\nअच्छी बात यह है कि RBI ने फिलहाल कैश रिजर्व रेशियो (CRR) बढ़ाने जैसा सख्त कदम नहीं उठाया है। इससे पता चलता है कि सेंट्रल बैंक सिस्टम को अचानक झटका दिए बिना बहुत ही बारीकी से 'कैलिब्रेटेड अप्रोच' अपना रहा है।\n\n### आंकड़ों में समझें\n\nकोर लिक्विडिटी, जो रोज के उतार-चढ़ाव को हटाकर असली ट्रेंड बताती है, वह 4 सितंबर को ₹14.2 लाख करोड़ के पीक से गिरकर अब ₹11.5 लाख करोड़ पर आ गई है। आने वाले हफ्तों में निवेशकों को बॉन्ड यील्ड्स पर नजर रखनी होगी, क्योंकि इसके बढ़ने से डेट-हैवी कंपनियों पर दबाव बढ़ सकता है।