बैंकिंग सिस्टम में आई भारी नकदी को नियंत्रित करने के लिए Reserve Bank of India ने बड़ा कदम उठाया है। 9 सितंबर, 2026 को RBI ने 'सेल-बाय' फॉरेक्स स्वैप (sell-buy forex swaps) के जरिए सिस्टम से अतिरिक्त लिक्विडिटी को बाहर निकाला है। देश में कैश का सरप्लस रिकॉर्ड **₹11 लाख करोड़** के स्तर पर पहुंच गया है।
बैंकिंग सिस्टम में नकदी का अंबार लगने के बाद RBI ने बाजार में दखल दिया है। केंद्रीय बैंक ने 'सेल-बाय स्वैप' मैकेनिज्म का इस्तेमाल किया है, जिसके तहत RBI बैंकों को डॉलर बेचता है और भविष्य में उन्हें वापस खरीदने का एग्रीमेंट करता है। इस कवायद का मकसद सिस्टम से अतिरिक्त रुपए को खींचकर ब्याज दरों में स्थिरता बनाए रखना है।
क्यों पड़ी इस कदम की जरूरत?
देश में नकदी का सरप्लस ₹11 लाख करोड़ तक पहुंच गया है। इसकी मुख्य वजह पिछले दिनों विदेशी निवेश का भारी प्रवाह है, जो $136 बिलियन से अधिक रहा है। जब विदेशी डॉलर बाजार में आते हैं, तो उसके बदले सिस्टम में भारी मात्रा में रुपए जुड़ जाते हैं, जिससे शॉर्ट-टर्म इंटरेस्ट रेट्स के गिरने और महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो जाता है।
बिजनेस और ट्रेड पर असर
इस कदम का सीधा असर फॉर्वर्ड प्रीमियम पर दिखा है। सितंबर फॉर्वर्ड प्रीमियम बढ़कर 10.75 पैसे हो गया है। कंपनियों के लिए इसका मतलब यह है कि करेंसी में उतार-चढ़ाव से बचने के लिए जो हेजिंग (hedging) वे करती हैं, उसकी लागत अब बढ़ गई है। इससे आयातकों (importers) और निर्यातकों (exporters) का कारोबार थोड़ा महंगा हो सकता है।
RBI की भविष्य की रणनीति
फिलहाल RBI, CRR (कैश रिजर्व रेशियो) जैसे सख्त कदम उठाने के बजाय 'वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो ऑक्शन' और 'फॉरेक्स स्वैप' जैसे लचीले औजारों को प्राथमिकता दे रहा है। हालांकि, बाजार की नजर अब इस पर है कि आरबीआई कब तक इन सुविधाओं का उपयोग करता है और क्या तेल की कीमतों जैसी वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच वह और सख्त कदम उठाएगा या नहीं।
