RBI का बड़ा कदम: AI से चलने वाली बैंकिंग में अब इंसानी दखल ज़रूरी, 'किल स्विच' भी होंगे

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AuthorNeha Patil|Published at:
RBI का बड़ा कदम: AI से चलने वाली बैंकिंग में अब इंसानी दखल ज़रूरी, 'किल स्विच' भी होंगे

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और मशीन लर्निंग (ML) के इस्तेमाल से चलने वाली बैंकिंग के लिए एक अहम ड्राफ्ट फ्रेमवर्क जारी किया है। इसके तहत, अब AI से लिए जाने वाले हर बैंकिंग फैसले में इंसानी दखल ज़रूरी होगा। बैंकों को 'किल स्विच' जैसे फीचर भी लागू करने होंगे ताकि ऑटोमेटेड प्रोसेस में ज़रूरत पड़ने पर इंसान हस्तक्षेप कर सके।

ऑटोमेटेड फैसलों पर इंसानी नियंत्रण

RBI के नए ड्राफ्ट मॉडल रिस्क मैनेजमेंट (Model Risk Management) फ्रेमवर्क के मुताबिक, बैंकों को अपने एनालिटिकल मॉडल्स के प्रदर्शन की पूरी ज़िम्मेदारी लेनी होगी, भले ही वे मॉडल इन-हाउस बनाए गए हों या थर्ड-पार्टी वेंडर से खरीदे गए हों। इस फ्रेमवर्क में यह भी कहा गया है कि बैंकों को मॉडल के डेवलपमेंट से लेकर उसके रिटायरमेंट तक की पूरी प्रक्रिया के लिए बोर्ड से स्वीकृत पॉलिसी बनानी होगी। हर मॉडल को लाइव होने से पहले इंडिपेंडेंट वैलिडेशन से गुज़रना होगा, भले ही टेक्नोलॉजी सप्लायर ने उसे पहले ही सर्टिफ़ाई कर दिया हो।

'किल स्विच' और इंसानी निगरानी

टेक्नोलॉजी पर ज़्यादा निर्भरता के जोखिम को कम करने के लिए, RBI ने 'ह्यूमन-इन-द-लूप' (human-in-the-loop) सिद्धांत का प्रस्ताव दिया है। इसका मतलब है कि बैंक कर्मचारियों के पास ऑटोमेटेड फैसलों पर सवाल उठाने, उन्हें बदलने या रोकने का अधिकार होगा। अगर किसी सिस्टम से अनपेक्षित नतीजे आते हैं, तो बैंकों को तुरंत AI मॉडल को सस्पेंड करने के लिए इमरजेंसी प्रोटोकॉल, जिन्हें 'किल स्विच' कहा जाता है, एक्टिवेट करने होंगे।

RBI ने खासतौर पर 'ऑटोमेशन बायस' (Automation Bias) यानी कर्मचारियों का कंप्यूटर के आउटपुट पर आंख मूंदकर भरोसा करना और 'डिसीजन फटीग' (decision fatigue) यानी सुपरविज़न में गलतियों को लेकर चिंता जताई है। उन सिस्टम्स के लिए जो सीधे ग्राहकों से इंटरैक्ट करते हैं, ड्राफ्ट में यह ज़रूरी होगा कि बैंक AI के इस्तेमाल के बारे में स्पष्ट रूप से बताएं और ग्राहकों को किसी इंसान से बात करने का विकल्प भी दें।

गवर्नेंस और रिस्क क्लासिफिकेशन

बैंकों को अपने मॉडल्स को उनकी जटिलता और रिस्क लेवल के आधार पर कैटेगरी में बांटना होगा। जो मॉडल हाई-रिस्क के माने जाएंगे, उन्हें डिप्लॉय करने से पहले बैंक की रिस्क मैनेजमेंट कमेटी से अप्रूवल लेना होगा। इसके अलावा, संस्थानों को सभी मॉडल्स की एक विस्तृत इन्वेंट्री (inventory) बनाए रखनी होगी। रिटायर या डीकमीशन किए गए मॉडल्स का रिकॉर्ड कम से कम 10 साल तक रखना होगा ताकि भविष्य में ऑडिटिंग और परफॉर्मेंस रिव्यू किए जा सकें।

डिजिटल बैंकिंग पर असर

यह फ्रेमवर्क भारतीय बैंकिंग सेक्टर के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है, जो सिर्फ कंप्लायंस से आगे बढ़कर ऑपरेशनल रेसिलिएंस (operational resilience) बनाने की ओर इशारा करता है। जैसे-जैसे बैंक AI को क्रेडिट अंडरराइटिंग, ट्रेज़री मैनेजमेंट और फ्रॉड डिटेक्शन जैसे संवेदनशील कामों में इंटीग्रेट करेंगे, स्पेशलाइज़्ड टेक्निकल स्टाफ और इंडिपेंडेंट वैलिडेशन प्रोसेस की ज़रूरत के कारण टेक्नोलॉजी इम्प्लीमेंटेशन का खर्च बढ़ सकता है। इन्वेस्टर्स इस बात पर नज़र रखेंगे कि बड़े प्राइवेट और पब्लिक सेक्टर के बैंक आने वाली तिमाहियों में इन सख्त रेगुलेटरी ज़रूरतों के मुताबिक अपने डिजिटल बजट और वेंडर पार्टनरशिप को कैसे एडजस्ट करते हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.