RBI का बड़ा फैसला: रेटिंग एजेंसियां अब बैंक डिपॉजिट के लिए RBI को रेगुलेटर नहीं बता पाएंगी!

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
RBI का बड़ा फैसला: रेटिंग एजेंसियां अब बैंक डिपॉजिट के लिए RBI को रेगुलेटर नहीं बता पाएंगी!

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों (CRAs) को एक बड़ा निर्देश जारी किया है। अब से एजेंसियां बैंक डिपॉजिट रेटिंग के लिए RBI को रेगुलेटर के तौर पर नहीं बता पाएंगी। इस कदम से SEBI के नियमों के साथ टकराव पैदा हो गया है।

RBI का नया फरमान, रेटिंग एजेंसियों के लिए बढ़ी मुश्किलें

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने देश की तमाम क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों (CRAs) को निर्देश दिया है कि वे अब बैंक डिपॉजिट की रेटिंग करते समय केंद्रीय बैंक का नाम रेगुलेटर के तौर पर इस्तेमाल न करें। यह निर्देश एजेंसियों के लिए डॉक्यूमेंटेशन प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण बदलाव लेकर आया है।

SEBI के नियम और RBI के निर्देश में टकराव

इस पूरे मामले की जड़ें सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) के मौजूदा नियमों में हैं। SEBI के नियमों के तहत, किसी भी फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट की रेटिंग जारी करने वाली एजेंसी को उस इंस्ट्रूमेंट के लिए जिम्मेदार सेक्टर रेगुलेटर का स्पष्ट रूप से उल्लेख करना होता है। RBI बैंकों को रेगुलेट करता है, लेकिन वह सीधे तौर पर 'बैंक डिपॉजिट की रेटिंग' जैसे विशिष्ट व्यावसायिक प्रक्रिया का रेगुलेटर नहीं है, जैसा कि SEBI अन्य सिक्योरिटीज के लिए चाहता है। इसी वजह से RBI ने एजेंसियों को इस संदर्भ में अपना नाम न इस्तेमाल करने को कहा है।

क्या बंद हो जाएंगी बैंक डिपॉजिट की रेटिंग?

RBI के इस निर्देश से रेटिंग एजेंसियां एक मुश्किल स्थिति में फंस गई हैं। अगर वे RBI के निर्देश का पालन करते हुए RBI का नाम हटा देती हैं, तो वे SEBI की 'सेक्टर रेगुलेटर की पहचान' वाली शर्त को पूरा नहीं कर पाएंगी। ऐसे में, यह उम्मीद की जा रही है कि कई क्रेडिट रेटिंग फर्में दोनों नियामकों के बीच संभावित विनियामक टकराव से बचने के लिए बैंक डिपॉजिट की रेटिंग करना पूरी तरह बंद कर सकती हैं।

निवेशकों पर क्या होगा असर?

यह बदलाव निवेशकों के लिए उपलब्ध जानकारी को कम कर सकता है। बाहरी रेटिंग का इस्तेमाल अक्सर लोग यह समझने के लिए करते हैं कि बैंक डिपॉजिट कितने सुरक्षित हैं और उनमें कितना जोखिम है। हालांकि, कोई भी रेटिंग सुरक्षा की गारंटी नहीं होती, यह बैंक के वित्तीय स्वास्थ्य का एक स्वतंत्र आकलन प्रदान करती है। इन रेटिंग्स के खत्म होने से अनिश्चितता बढ़ सकती है, खासकर छोटे या सहकारी बैंकों के मामले में, जिनके लिए जमाकर्ता अक्सर इन मूल्यांकनों पर भरोसा करते हैं।

रेटिंग का न होना यह संकेत नहीं देता कि बैंक असुरक्षित है, लेकिन इसका मतलब यह होगा कि मूल्यांकन की एक स्वतंत्र परत गायब हो जाएगी। यह भी चिंता है कि रेटिंग्स के हटने से डिपॉजिट मार्केट में अस्थिरता आ सकती है, अगर जमाकर्ताओं के पास विभिन्न संस्थानों की वित्तीय स्थिरता की तुलना करने का एक मानक तरीका नहीं रह जाएगा। अब बाजार की नजरें इस बात पर होंगी कि क्या SEBI या RBI की ओर से कोई स्पष्टीकरण आता है जो इस टकराव को सुलझा सके। निवेशकों को आगे के अपडेट्स पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि इससे तय होगा कि बैंक डिपॉजिट की रेटिंग अपने मौजूदा स्वरूप में जारी रहती है या नहीं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.