भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने Tata Sons की उस अपील को ठुकरा दिया है जिसमें कंपनी ने अपने Core Investment Company (CIC) रजिस्ट्रेशन को सरेंडर करने की अनुमति मांगी थी। अब कंपनी को Upper-Layer NBFC के दायरे में ही बने रहना होगा, जिसका मतलब है कि Tata Sons के लिए पब्लिक लिस्टिंग की अनिवार्यता अब भी बरकरार है।
भारतीय रिजर्व बैंक ने देश के सबसे बड़े कॉरपोरेट घराने को लेकर एक बड़ा फैसला सुनाया है। 11 सितंबर, 2026 के अपने आदेश में केंद्रीय बैंक ने स्पष्ट कर दिया है कि Tata Sons अब भी एक Core Investment Company (CIC) है। इस फैसले के साथ ही कंपनी का 'Upper-Layer Non-Banking Financial Company' (NBFC-UL) का दर्जा कायम रहेगा, जिससे कंपनी पर सख्त रेगुलेटरी नियम लागू रहेंगे।
क्यों ठुकराई गई अपील?
रेगुलेटरी नियमों के मुताबिक, मार्च 2026 तक Tata Sons का एसेट बेस लगभग ₹2.01 लाख करोड़ तक पहुंच गया है। चूंकि यह आंकड़ा ₹1 लाख करोड़ की तय सीमा से कहीं ज्यादा है, इसलिए कंपनी का 'अपर-लेयर' NBFC में आना अनिवार्य हो जाता है। कंपनी ने डी-रजिस्ट्रेशन की कोशिश इसलिए की थी ताकि वे सितंबर 2025 की मूल लिस्टिंग डेडलाइन से बच सकें, लेकिन RBI के रुख ने अब उनके लिए फिर से लिस्टिंग का रास्ता खोल दिया है।
स्टेकहोल्डर्स के बीच फंसा पेच
यह स्थिति कंपनी के आंतरिक गवर्नेंस के लिए एक बड़ी चुनौती है। Tata Trusts के पास कंपनी की 66% हिस्सेदारी है और वे लंबे समय से पब्लिक लिस्टिंग के खिलाफ रहे हैं। दूसरी ओर, Shapoorji Pallonji Group, जिसके पास 18.37% हिस्सेदारी है, लिक्विडिटी के लिए IPO का पक्षधर रहा है। केंद्रीय बैंक के इस फैसले ने कंपनी को इन दोनों खेमों के बीच सामंजस्य बैठाने के लिए मजबूर कर दिया है।
निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?
फिलहाल RBI ने लिस्टिंग के लिए कोई नई डेडलाइन नहीं दी है, लेकिन बाजार की निगाहें कंपनी के बोर्ड की अगली बैठक पर टिकी हैं। फिलहाल कंपनी के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन का कार्यकाल फरवरी 2027 में खत्म हो रहा है, ऐसे में नेतृत्व और कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर में बदलाव की संभावनाओं को भी नकारा नहीं जा सकता। अब निवेशक इस बात पर नजर रखेंगे कि कंपनी कानूनी विकल्पों का सहारा लेती है या फिर अपनी लिस्टिंग की तैयारी शुरू करती है।
