रुपये को **97** प्रति डॉलर के स्तर तक फिसलने से रोकने के लिए RBI का आक्रामक रुख भारी पड़ रहा है। इस दखल के कारण मार्केट में लिक्विडिटी (Liquidity) कम हो गई है और हेजिंग (Hedging) लागत **2016** के बाद के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने रुपये की गिरती चाल को थामने के लिए 2013 के बाद अपना सबसे बड़ा दखल दिया है। केंद्रीय बैंक का लक्ष्य रुपये को 97 के स्तर के नीचे जाने से रोकना है। हालांकि, यह कदम अस्थायी तौर पर तो काम कर रहा है, लेकिन घरेलू फाइनेंशियल मार्केट पर इसके गंभीर दुष्प्रभाव दिखने लगे हैं।
क्यों बढ़ रही है परेशानी?
RBI ने डॉलर की सट्टेबाजी को रोकने और डेरिवेटिव ट्रांजेक्शन पर लगाम लगाने के लिए मार्केट में लिक्विडिटी कम कर दी है। लिक्विडिटी का मतलब है कि बाजार में आसानी से खरीदारी या बिकवाली हो सके। जब मार्केट में लिक्विडिटी कम होती है, तो कंपनियों के लिए अपने करेंसी रिस्क को कवर करना यानी 'हेजिंग' (Hedging) करना काफी महंगा हो जाता है। इसका सीधा असर फॉरवर्ड्स मार्केट पर पड़ रहा है, जहां हेजिंग लागत 8 साल के सबसे ऊपरी स्तर पर है।
बैंकिंग सेक्टर पर दबाव
इस करेंसी डिफेंस का असर अब कमर्शियल बैंकों के ट्रेजरी डेस्क पर भी दिख रहा है। बढ़ते बॉन्ड यील्ड और कम विदेशी व्यापार के कारण बैंकों के फिक्स्ड-इनकम पोर्टफोलियो पर दबाव है। RBL Bank के जानकारों का मानना है कि यदि लिक्विडिटी लंबे समय तक इसी तरह सीमित रही, तो बैंकिंग सिस्टम के लिए जोखिम बढ़ सकते हैं।
ग्लोबल निवेशकों की क्या है राय?
UBS Asset Management और State Street जैसे बड़े ग्लोबल संस्थानों का मानना है कि RBI सिर्फ लक्षणों का इलाज कर रहा है, जबकि रुपये की कमजोरी की जड़ें स्टिकी इन्फ्लेशन (महंगाई), कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और कैपिटल आउटफ्लो में हैं। विदेशी निवेशकों को डर है कि जब तक इन बुनियादी समस्याओं का समाधान नहीं होगा, तब तक यह स्थिरता महज एक दिखावा है।
