Reserve Bank of India (RBI) द्वारा सख्त फॉरेक्स नियमों के लागू होते ही डॉलर फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स की मांग में **35%** की बड़ी गिरावट आई है। अक्टूबर में यह मांग घटकर **$49.5 बिलियन** रह गई है, जिससे रुपया तो **2%** मजबूत हुआ, लेकिन कंपनियों के लिए हेजिंग का खर्च काफी बढ़ गया है।
अक्टूबर 2026 में डॉलर फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स का मार्केट सुस्त पड़ गया है। सितंबर के रिकॉर्ड स्तर के मुकाबले 35% की कमी के साथ, कॉर्पोरेट मांग गिरकर $49.5 बिलियन पर आ गई है। RBI की सीधी दखलंदाजी और सट्टेबाजी पर लगाम लगाने के प्रयासों ने बाजार की तस्वीर बदल दी है।
RBI के कड़े कदम और असर
सेंट्रल बैंक ने फॉरेक्स मार्केट को शांत करने के लिए $2 मिलियन से बड़े डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स पर 20% का 'फॉरेन एक्सचेंज रिस्क रिजर्व' (FERR) अनिवार्य कर दिया है। इसका सीधा मतलब है कि कंपनियों को अब हेजिंग के लिए पहले से ज्यादा नकदी ब्लॉक करनी पड़ रही है। साथ ही, Indian Oil, Hindustan Petroleum और Bharat Petroleum जैसी सरकारी तेल कंपनियों के लिए अलग 'डॉलर विंडो' खोलकर RBI ने ओपन मार्केट से डॉलर की मांग को कम कर दिया है, जिससे रुपये को 2% की बढ़त मिली है।
निवेशकों के लिए जोखिम
शॉर्ट टर्म में रुपये को सहारा तो मिला है, लेकिन कंपनियों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। आयात पर निर्भर कंपनियों के लिए हेजिंग का महंगा होना उनके ऑपरेटिंग मार्जिन (Operating Margin) पर सीधा दबाव डाल सकता है। इसके अलावा, विदेशी निवेशकों का रुझान भी घटा है। अक्टूबर में विदेशी निवेशकों ने $590 मिलियन का डेट (Debt) बेचा है, जो लगातार दूसरे महीने शुद्ध निकासी (Net Outflow) को दर्शाता है।
आगे क्या रहेगा अहम?
RBI की ये नीतियां टैक्टिकल हैं, स्ट्रक्चरल नहीं। तेल आयात और ट्रेड बैलेंस का दबाव अभी भी बना हुआ है। अब बाजार की नजरें इन इंपोर्ट-आधारित कंपनियों के अगले क्वार्टरली नतीजों पर और विदेशी निवेशकों के फ्लो पर टिकी रहेंगी कि क्या ये पाबंदियां मार्केट को और प्रभावित करेंगी या स्थिति सामान्य हो जाएगी।
