भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) आज, 8 जुलाई को बैंकिंग सिस्टम में ₹25,000 करोड़ डालने जा रहा है। यह पैसा एक ओवरनाइट वेरिएबल रेट रेपो (VRR) ऑक्शन के जरिए इंजेक्ट किया जाएगा। खास बात यह है कि सिस्टम में पहले से ही ₹1 लाख करोड़ से ज्यादा का सरप्लस है।
RBI का लिक्विडिटी मैनेजमेंट
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) आज, 8 जुलाई को एक ओवरनाइट वेरिएबल रेट रेपो (VRR) ऑक्शन के जरिए भारतीय बैंकिंग सिस्टम में ₹25,000 करोड़ डालेगा। यह ऑक्शन सुबह 9:30 बजे से 10:00 बजे के बीच होगा। इस प्रक्रिया के तहत, बैंक सरकारी सिक्योरिटीज को गिरवी रखकर यह शॉर्ट-टर्म फंड्स एक्सेस कर सकते हैं। यह पैसा कल, 9 जुलाई को मैच्योर हो जाएगा।
कैसे मैनेज होती है लिक्विडिटी?
फिक्स्ड-रेट लिक्विडिटी ऑपरेशंस के विपरीत, यह वेरिएबल रेट रेपो बैंकों को मार्केट की डिमांड के आधार पर रेट तय करने की सुविधा देता है। इससे सेंट्रल बैंक को लिक्विडिटी को बेहतर ढंग से मैनेज करने में मदद मिलती है। RBI के अनुसार, यह कदम इकोनॉमी में लिक्विडिटी की बदलती स्थिति की रूटीन समीक्षा के बाद उठाया गया है। यह RBI के लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फैसिलिटी (LAF) का हिस्सा है, जिसका इस्तेमाल बैंकिंग सेक्टर को सुचारू रूप से चलाने के लिए जरूरी फंड्स की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है।
सिस्टम लिक्विडिटी का हाल
हालांकि यह इंजेक्शन किया जा रहा है, लेकिन अभी बैंकिंग सिस्टम में फंड्स की भारी अधिकता (सरप्लस) है। 6 जुलाई के आंकड़ों के मुताबिक, सिस्टम सरप्लस लगभग ₹1.19 लाख करोड़ था। इसका मतलब है कि बैंकों के पास आमतौर पर पर्याप्त कैश रिजर्व मौजूद है। इन लिक्विडिटी विंडोज की डिमांड भी कई बार कम रही है। उदाहरण के लिए, 7 जुलाई को हुए पिछले ऑक्शन में बैंकों ने ₹50,000 करोड़ के नोटिफाइड अमाउंट के मुकाबले सिर्फ ₹1,135 करोड़ की बोली लगाई थी। यह कम मांग बैंकिंग सिस्टम में फंड्स की मौजूदा अधिकता को दर्शाती है।
आगे क्या?
जून से, सेंट्रल बैंक इन लेवल्स को मैनेज करने में सक्रिय रहा है, और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न VRR ऑक्शंस के माध्यम से ₹6 लाख करोड़ से अधिक इंजेक्ट कर चुका है। मार्केट पार्टिसिपेंट्स के लिए, मुख्य बात यह देखना है कि जैसे-जैसे फाइनेंशियल ईयर आगे बढ़ेगा, सेंट्रल बैंक लिक्विडिटी को कैसे अवशोषित (absorb) या इंजेक्ट (inject) करता है। निवेशक आमतौर पर इन ऑपरेशंस पर नजर रखते हैं ताकि इंटरेस्ट रेट एनवायरनमेंट और इकोनॉमी में क्रेडिट की ओवरऑल उपलब्धता को समझ सकें। लिक्विडिटी पर अगले अपडेट्स सरकारी खर्च, टैक्स कलेक्शन और करेंसी की मांग में होने वाले बदलावों पर निर्भर करेंगे, जो सभी बैंकिंग सेक्टर की कैश पोजीशन को प्रभावित करते हैं।
