RBI ने अपनी स्पेशल FCNR(B) स्वैप सुविधा को समय से पहले ही बंद कर दिया है। इस प्रोग्राम के जरिए सेंट्रल बैंक ने **$72.8 बिलियन** का फॉरेक्स इनफ्लो जुटाया है, जिसका मकसद रुपये की स्थिरता और फॉरेक्स रिजर्व को मजबूत करना था।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अपनी स्पेशल फॉरेन करेंसी नॉन-रेसिडेंट (बैंक) स्वैप सुविधा को 30 सितंबर, 2026 की तय समय सीमा से पहले ही समाप्त कर दिया है। 21 अगस्त, 2026 तक, इस प्रोग्राम के जरिए कुल $72.8 बिलियन का विदेशी मुद्रा इनफ्लो हासिल हुआ है, जिससे देश के एक्सटर्नल रिजर्व में बड़ा उछाल आया है।\n\nइस कुल राशि में से $65.4 बिलियन सीधे FCNR(B) डिपॉजिट से आए हैं। विंडो को समय से पहले बंद करना आरबीआई के बढ़ते भरोसे और लिक्विडिटी मैनेजमेंट के प्रति उनके संतुलित रुख को दर्शाता है।\n\n### अस्थिरता के खिलाफ बफर\n\nइस स्वैप सुविधा का मुख्य उद्देश्य रुपये को जबरदस्ती मजबूत करना नहीं, बल्कि बाजार की अस्थिरता के दौरान डॉलर की मांग को सोखना था। जब यह सुविधा सक्रिय थी, तब भारतीय रुपया 95 से 96 के दायरे में स्थिर रहा, जबकि मई 2026 में इसके 97 के स्तर तक गिरने का डर था।\n\nआरबीआई ने बैंकों के साथ सीधे डॉलर स्वैप करके लिक्विडिटी को अपने बैलेंस शीट पर ले लिया, जिससे स्पॉट मार्केट में डॉलर की बाढ़ नहीं आई और बाजार में अनिश्चितता कम रही।\n\n### लिक्विडिटी और रिस्क पर असर\n\nआरबीआई द्वारा सोखे गए हर डॉलर के बदले बैंकिंग सिस्टम में रुपये की लिक्विडिटी बढ़ी। हालांकि इससे बाजार स्थिर रहा, लेकिन इसने मनी सप्लाई मैनेजमेंट को थोड़ा जटिल बना दिया। अब आरबीआई ने संकेत दिया है कि लिक्विडिटी को मैनेज करने की लागत, रिजर्व बढ़ाने के फायदों से अधिक होने लगी है।\n\nनिवेशकों को कच्चे तेल की कीमतों और भारत-अमेरिका के बीच ब्याज दरों के अंतर पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि ये फैक्टर्स आगे चलकर रुपये पर दबाव बना सकते हैं।
