Reserve Bank of India (RBI) ने अपने हालिया बुलेटिन में बैंकिंग सेक्टर को लेकर एक बड़ी बात कही है। रिजर्व बैंक ने साफ किया है कि बैंक डिपॉजिट (Deposits) के बिना भी क्रेडिट (क्रेडिट क्रिएशन) कर सकते हैं, इसलिए केवल हाई CD Ratio को जोखिम मान लेना सही नहीं है।
बैंकिंग कामकाज का नया नजरिया
RBI के ताजा बुलेटिन में उन मान्यताओं को चुनौती दी गई है, जिन्हें हम वर्षों से बैंकिंग सिस्टम का आधार मानते आए थे। आमतौर पर माना जाता है कि बैंक पहले डिपॉजिट जुटाते हैं और फिर लोन बांटते हैं, लेकिन रिजर्व बैंक ने स्पष्ट किया है कि आधुनिक बैंकिंग सिस्टम में 'क्रेडिट' और 'डिपॉजिट' एक साथ तैयार होते हैं।
डिपॉजिट और क्रेडिट का गणित
सेंट्रल बैंक के अनुसार, क्रेडिट क्रिएशन केवल मौजूदा डिपॉजिट्स तक सीमित नहीं है। लेंडिंग (Lending) की प्रक्रिया खुद नए डिपॉजिट्स को जन्म देती है। यह मुख्य रूप से 3 तरीकों से होता है: नया बैंक क्रेडिट, ताज़ा निवेश, और विदेशी पूंजी का प्रवाह। जब कर्ज चुकाया जाता है या नकदी निकाली जाती है, तो डिपॉजिट्स कम हो सकते हैं, लेकिन बैंकों के पास कैपिटल और बॉरोइंग जैसे अन्य विकल्प मौजूद होते हैं, जिनसे वे अपनी लेंडिंग एक्टिविटी को बढ़ा सकते हैं।
निवेशकों के लिए अहम सबक
बाजार में अक्सर 'हाई क्रेडिट-डिपॉजिट रेशियो' (CD Ratio) को बैंकिंग सिस्टम के तनाव या लिक्विडिटी क्राइसिस के संकेत के रूप में देखा जाता है। RBI का तर्क है कि इसे गलत समझा जाता है। तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में, हाई CD Ratio का मतलब केवल यह हो सकता है कि बैंक सक्रिय रूप से क्रेडिट ग्रोथ को बढ़ावा दे रहे हैं। सिर्फ इस एक रेशियो के आधार पर बैंक की फाइनेंशियल स्टेबिलिटी को आंकना जोखिम भरा हो सकता है।
अब क्या देखें?
RBI ने निवेशकों को सलाह दी है कि वे बैंकिंग स्टॉक्स का विश्लेषण करते समय और व्यापक पैमानों पर गौर करें। इसमें नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM), लिक्विडिटी कवरेज रेशियो (LCR), और एसेट क्वालिटी जैसे पैरामीटर्स शामिल हैं। एक संपूर्ण बैलेंस शीट एनालिसिस ही यह समझने के लिए काफी है कि बैंक अपनी क्रेडिट क्रिएशन क्षमता को कैसे मैनेज कर रहे हैं।
