RBI ने NBFC नियमों में बड़ा बदलाव करते हुए Tata Sons की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। सेंट्रल बैंक ने स्पष्ट किया है कि कंपनी अब भी 'Upper Layer NBFC' के दायरे में आती है, जिससे इसे अगले **3 साल** के भीतर शेयर बाजार में लिस्ट होना ही होगा।
RBI की सख्ती और लिस्टिंग का दबाव
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFCs) को लेकर नई गाइडलाइन्स जारी की हैं, जिसने Tata Sons की उस कोशिश पर पानी फेर दिया है, जिसमें वे अपना रजिस्ट्रेशन सरेंडर करना चाहते थे। सेंट्रल बैंक का साफ कहना है कि भले ही कंपनी स्टैंडअलोन बेसिस पर कर्जमुक्त हो गई हो, लेकिन वह अब भी 'Upper Layer NBFC' बनी हुई है।
क्यों नहीं बच पा रही कंपनी?
Tata Sons का तर्क था कि चूंकि अब वे पब्लिक फंड पर निर्भर नहीं हैं, इसलिए उन पर रेगुलेटरी नियम लागू नहीं होने चाहिए। हालांकि, RBI ने 'पब्लिक फंड' की परिभाषा को और व्यापक बना दिया है। इसमें अब वे फंड्स भी शामिल हैं जो ग्रुप कंपनियों या सहयोगियों के जरिए जुटाए जाते हैं। चूंकि Tata Sons कई बड़ी फाइनेंशियल कंपनियों को कंट्रोल और फाइनेंस करती है, इसलिए रेगुलेटर इसे सिस्टम के लिए जरूरी मानता है।
बॉम्बे हाई कोर्ट तक पहुँचा मामला
RBI इस मामले में कोई जोखिम नहीं लेना चाहता। रेगुलेटर ने बॉम्बे हाई कोर्ट में एक 'कैविएट' (Caveat) फाइल की है ताकि अगर Tata Sons इस फैसले को कानूनी चुनौती दे, तो आरबीआई का पक्ष भी सुना जाए। यह साफ संकेत है कि सिस्टमैटिक रिस्क को देखते हुए रेगुलेटर लिस्टिंग के मामले में बिल्कुल भी नरमी बरतने के मूड में नहीं है।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
निवेशकों की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि Tata Sons का मैनेजमेंट इस पर क्या फैसला लेता है। अभी कोई निश्चित IPO तारीख नहीं आई है, लेकिन 3 साल का रेगुलेटरी टाइमलाइन अब एक बड़ा चैलेंज है। बाजार अब यह देख रहा है कि क्या कंपनी लिस्टिंग की प्रक्रिया शुरू करती है या फिर रेगुलेटर के साथ किसी और कानूनी रास्ते पर आगे बढ़ती है।
