स्टेबलकॉइन्स पर RBI की चिंता
RBI की 'पेमेंट्स सिस्टम्स रिपोर्ट' में स्टेबलकॉइन्स को लेकर गंभीर चिंता जताई गई है। बैंक का मानना है कि ये डिजिटल संपत्ति मौद्रिक प्रणाली और वित्तीय स्थिरता के लिए बड़ा जोखिम पैदा कर सकती हैं। RBI ने स्पष्ट किया है कि ये खास तरह के डिजिटल टोकन, पैसे के बुनियादी सिद्धांतों 'एकल, लचीलापन और अखंडता' को पूरा नहीं करते, जो किसी भी मजबूत मौद्रिक प्रणाली के लिए जरूरी हैं। इसके उलट, RBI अपनी खुद की डिजिटल करेंसी (CBDC) को ज्यादा सुरक्षित और भरोसेमंद मान रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि CBDC पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण और गारंटी के साथ आती है, जबकि स्टेबलकॉइन्स की स्थिरता निजी जारीकर्ताओं पर निर्भर करती है। रिपोर्ट ने यह भी बताया है कि कैसे दुनिया भर के केंद्रीय बैंक निजी डिजिटल संपत्तियों को लेकर सतर्क रवैया अपना रहे हैं।
UPI का दबदबा कायम
रिपोर्ट में भारत के डिजिटल पेमेंट सिस्टम में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) के बेताज बादशाह होने की पुष्टि की गई है। 2025 की दूसरी छमाही (H2CY25) में, कुल पेमेंट वॉल्यूम में UPI की हिस्सेदारी 85.5% रही। इस दौरान 142.25 बिलियन से ज्यादा रिटेल ट्रांजेक्शन हुए, जो पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 28% ज्यादा है। हालांकि, क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड और UPI QR कोड जैसे माध्यमों में भी बढ़त देखी गई, लेकिन कुछ पारंपरिक पेमेंट तरीकों जैसे PPI कार्ड, PoS टर्मिनल और ATM में गिरावट दर्ज की गई। UPI की यह शानदार पकड़ इसके आसानी से इस्तेमाल होने, कम लागत और सरकार के मजबूत समर्थन का नतीजा है।
ग्लोबल ट्रेंड और RBI का नज़रिया
RBI का स्टेबलकॉइन्स के प्रति सख्त रुख दुनिया भर के कई केंद्रीय बैंकों के मिले-जुले विचारों को दर्शाता है। जहाँ एक ओर चीन अपना डिजिटल युआन (Digital Yuan) ला रहा है और यूरोप डिजिटल यूरो (Digital Euro) पर काम कर रहा है, वहीं निजी स्टेबलकॉइन्स के लिए रेगुलेटरी फ्रेमवर्क अभी भी एक बड़ी चुनौती है। ग्लोबल फाइनेंशियल स्टेबिलिटी बोर्ड (FSB) जैसे निकाय क्रिप्टो-एसेट्स के लिए कड़े नियम बनाने की वकालत कर रहे हैं। RBI का यह ताजा कदम इस ओर इशारा करता है कि देश की प्राथमिकता एक सुरक्षित और स्थिर डिजिटल पेमेंट माहौल बनाना है, जिसमें सरकारी डिजिटल करेंसी की अहम भूमिका होगी।
क्या हैं इसके दूसरे पहलू?
हालांकि RBI सीबीडीसी को बढ़ावा दे रहा है और स्टेबलकॉइन्स के जोखिम गिना रहा है, कुछ लोग मानते हैं कि इस सख्ती से भारत के फिनटेक क्षेत्र में नवाचार (innovation) रुक सकता है। स्टेबलकॉइन्स को पूरी तरह से खारिज करने से ऐसे निजी समाधानों को आजमाने का मौका छूट सकता है जो सीबीडीसी अकेले नहीं दे सकतीं। यह भी संभव है कि वैश्विक स्तर पर स्टेबलकॉइन्स से उत्पन्न होने वाले सिस्टमैटिक रिस्क भारत को सीधे तौर पर प्रभावित न करें, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से कैपिटल फ्लो या वित्तीय बाजारों के जुड़ाव के कारण असर डाल सकते हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि स्टेबलकॉइन्स के लिए अधिक लचीला रेगुलेटरी दृष्टिकोण, जैसे कि सैंडबॉक्स (sandbox) या चरणबद्ध तरीके से स्वीकार करना, प्रतिस्पर्धा को बढ़ा सकता था।