Reserve Bank of India (RBI) रुपये में आने वाली भारी उठापटक को रोकने के लिए सक्रिय हो गया है। बैंक ने अपने **$73 बिलियन** के विदेशी फंड का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है ताकि डॉलर की बढ़ती मांग और क्रूड ऑयल की कीमतों के दबाव के बीच रुपया स्टेबल बना रहे।
RBI अब रुपये को मैनेज करने के लिए रिएक्टिव अप्रोच की जगह प्रो-एक्टिव रणनीति अपना रहा है। जून से जमा हुए $73 बिलियन के फॉरेन इनफ्लो का इस्तेमाल अब मार्केट में आने वाले झटकों को कम करने के लिए किया जा रहा है।
क्यों है यह हस्तक्षेप जरूरी?
पिछले कई हफ्तों से रुपया 95.70 से 95.75 के दायरे में सिमटा हुआ है। बैंक का लक्ष्य किसी खास लेवल पर जबरदस्ती रुपये को रोकना नहीं, बल्कि मार्केट में ऑर्डरली कंडीशन बनाए रखना है। इसके लिए RBI ऑनशोर और ऑफशोर दोनों बाजारों में सक्रिय है।
दबाव के कारण:
- क्रूड ऑयल: अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की बढ़ती कीमतें डॉलर की मांग को बढ़ा रही हैं, जिससे रुपये पर दबाव है।
- इंपोर्टर्स की हड़बड़ाहट: रुपये के गिरने के डर से आयातक डॉलर को तेजी से लॉक कर रहे हैं, जबकि निर्यातकों द्वारा डॉलर बेचने की रफ्तार काफी धीमी है।
भविष्य की चुनौतियां:
RBI के सामने $100 बिलियन से ज्यादा की डॉलर-सेलिंग ऑब्लिगेशन है। हालांकि विदेशी निवेश का बफर फिलहाल मदद कर रहा है, लेकिन बैंक को इकोनॉमिक ग्रोथ और करेंसी स्टेबिलिटी के बीच संतुलन बनाए रखना होगा। आने वाले महीनों में क्रूड ऑयल की चाल और मार्केट का डिमांड-सप्लाई डेटा ही तय करेगा कि रुपया किस दिशा में जाएगा।
