Reserve Bank of India (RBI) ने बैंकिंग सिस्टम में बढ़ी रिकॉर्ड लिक्विडिटी को नियंत्रित करने के लिए बड़ा कदम उठाया है। रिवर्स रेपो ऑक्शन के जरिए आरबीआई ने सिस्टम से **₹6.02 लाख करोड़** की निकासी की है, ताकि ब्याज दरों में स्थिरता बनी रहे।
लिक्विडिटी का रिकॉर्ड सरप्लस
4 सितंबर, 2026 को भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त नकदी को काबू करने के लिए दो वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) ऑक्शन आयोजित किए। सिस्टम में लिक्विडिटी सरप्लस ₹10.32 लाख करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था, जिसे कम करना आरबीआई के लिए जरूरी हो गया था।
क्यों बढ़ गई है नकदी?
इस बेतहाशा नकदी के पीछे मुख्य वजह विदेशी मुद्रा का भारी इनफ्लो है। अगस्त के अंत तक, यह विदेशी मुद्रा भंडार $136.38 बिलियन तक पहुंच गया था। जब डॉलर को रुपये में बदला जाता है, तो भारतीय बैंकिंग सिस्टम में कैश की भरमार हो जाती है। इसके अलावा, सरकारी खर्चों ने भी इस लिक्विडिटी को बढ़ाने का काम किया है।
ब्याज दरों पर क्या है असर?
जब बैंकों के पास कैश ज्यादा होता है, तो वे एक-दूसरे को बहुत कम ब्याज दर पर लोन देने लगते हैं। फिलहाल 'वेटेड एवरेज कॉल मनी रेट' 4.93% के आसपास है, जो आरबीआई के रेपो रेट से 32 बेसिस पॉइंट्स कम है। आरबीआई चाहता है कि मार्केट रेट उसके पॉलिसी रेट के करीब रहे ताकि इकोनॉमी को सही दिशा दी जा सके।
आरबीआई की चुनौती
आरबीआई VRRR ऑक्शन के जरिए बैंकों से पैसा वापस ले रही है। हालांकि, सरप्लस लगातार बना रहने के कारण केंद्रीय बैंक को बार-बार छोटे समय के ऑक्शन करने पड़ रहे हैं। अगर यह लिक्विडिटी लंबे समय तक इसी तरह ज्यादा बनी रहती है, तो यह महंगाई बढ़ा सकती है और आरबीआई के लिए ब्याज दरों को मैनेज करना मुश्किल हो सकता है। अब बाजार की नजर इस बात पर है कि आरबीआई आगे किस तरह के कदम उठाता है।
