Reserve Bank of India ने बाजार में मौजूद एक्स्ट्रा लिक्विडिटी को कम करने के लिए बड़ा कदम उठाया है। RBI ने रिवर्स रेपो ऑक्शन के जरिए बैंकिंग सिस्टम से ₹3.93 लाख करोड़ की नकदी सोख ली है, जबकि सिस्टम में कुल सरप्लस कैश ₹10.73 लाख करोड़ तक पहुंच गया है।
नकदी का दबाव और RBI का एक्शन
केंद्रीय बैंक ने सितंबर 15 को वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो ऑक्शन के जरिए बाजार से भारी नकदी निकाली है। RBI ने सभी बोलियां 5.24% की वेटेड एवरेज रेट पर स्वीकार कीं, जो रेपो रेट के काफी करीब है। बैंकिंग सिस्टम में नकदी का स्तर सितंबर 11 तक ₹10.73 लाख करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था, जिसे कंट्रोल करना अब प्राथमिकता बन गया है।
लिक्विडिटी बढ़ने की असली वजह
बाजार में नकदी की यह बाढ़ मुख्य रूप से FCNR डिपॉजिट में भारी इजाफे के कारण आई है। बैंकों ने इन डिपॉजिट्स के बदले RBI के साथ डॉलर-रुपया स्वैप डील की, जिससे सिस्टम में लिक्विडिटी का अंबार लग गया। इसके अलावा, सरकारी खर्च, सैलरी और पेंशन भुगतान ने भी नकदी के इस भंडार को और बढ़ा दिया है। जब लिक्विडिटी इतनी ज्यादा हो, तो शॉर्ट-टर्म मनी मार्केट रेट्स रेपो रेट से नीचे गिर जाते हैं, जो मॉनेटरी पॉलिसी के लिए चुनौती बन जाते हैं।
ओमो (OMO) सेल से निवेशकों पर असर
RBI अब केवल टेंपरेरी रिवर्स रेपो पर निर्भर नहीं है, बल्कि स्ट्रक्चरल बदलाव के लिए ₹1 लाख करोड़ के सरकारी बॉन्ड बेचने की तैयारी में है। ये ओपन मार्केट ऑपरेशंस (OMO) तीन चरणों में 17, 21 और 28 सितंबर को होंगे।
निवेशकों के लिए यह एक महत्वपूर्ण संकेत है। बॉन्ड की सप्लाई बढ़ने से कीमतें गिरेंगी और बॉन्ड यील्ड (Bond Yields) ऊपर जाएगी। जिन बैंकों के पास सरकारी बॉन्ड्स का बड़ा पोर्टफोलियो है, उनके लिए यह चिंता की बात हो सकती है क्योंकि यील्ड बढ़ने से बॉन्ड पोर्टफोलियो की वैल्यू पर बुरा असर पड़ सकता है। आने वाले दिनों में ओमो ऑक्शन के नतीजे यह तय करेंगे कि मार्केट में नकदी की स्थिति कब तक नॉर्मलाइज हो पाएगी।
