AI-संचालित निगरानी की ओर बड़ा कदम
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने 2026-27 के लिए अपने रणनीतिक रोडमैप में बड़ा बदलाव किया है। अब RBI आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को अपने रेगुलेटरी सुपरविजन का मुख्य आधार बनाएगा। e-Kuber 3.0 सिस्टम और पूरे बैंक में AI इकोसिस्टम को लागू करने पर फोकस किया जाएगा। इससे RBI को देश के विशाल डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर से उत्पन्न होने वाले हाई-फ्रीक्वेंसी डेटा को मैनेज करने में मदद मिलेगी। मैन्युअल निगरानी से हटकर मशीन-लर्निंग-संचालित मॉनिटरिंग पर जाने का लक्ष्य सिस्टम में आने वाले बड़े झटकों को पहले ही रोकना है।
डिजिटल रुपये का विस्तार और पेमेंट की चुनौतियां
RBI अब सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) यानी डिजिटल रुपये को सिर्फ पायलट प्रोजेक्ट तक सीमित नहीं रखेगा। डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर और बिजनेस-टू-बिजनेस सेटलमेंट में डिजिटल रुपये को इंटीग्रेट करने की योजना है। इससे मौजूदा बैंकिंग सिस्टम की लिक्विडिटी की समस्या को हल करने में मदद मिलेगी। हालांकि, इस तेजी के साथ सुरक्षा को लेकर भी सख्ती बरती जाएगी। डिजिटल अकाउंट्स के लिए 'किल स्विच' और ट्रांजेक्शन में जानबूझकर देरी जैसे फीचर्स लाए जाएंगे, जो फ्रॉड पेमेंट्स के बढ़ते मामलों पर लगाम लगाने के लिए हैं। इन फीचर्स से यूजर सेफ्टी तो बढ़ेगी, लेकिन पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स को नई कंप्लायंस लेयर्स के बीच काम करना होगा।
फॉरेक्स और क्रेडिट का जटिल गणित
पेमेंट सिस्टम के अलावा, फॉरेन एक्सचेंज रेगुलेशन में सुधार और क्रेडिट रिस्क डिस्ट्रिब्यूशन फ्रेमवर्क का लाना, घरेलू कैपिटल फ्लो को ग्लोबल बेस्ट प्रैक्टिसेज के साथ अलाइन करने की कोशिश को दिखाता है। रिटेल फॉरेक्स कन्वर्जन कॉस्ट में अनिवार्य पारदर्शिता से बैंकों के मार्जिन पर दबाव पड़ सकता है। वहीं, MSME पुनर्वास फ्रेमवर्क पर फोकस यह दर्शाता है कि RBI क्रेडिट क्वालिटी को लेकर चिंतित है। जैसे-जैसे RBI साइबर सिक्योरिटी स्टैंडर्ड को टाइट करेगा, वित्तीय संस्थानों को कंप्लायंस और डिजिटल फोरेंसिक के लिए ज्यादा ऑपरेशनल कॉस्ट उठानी पड़ेगी। इसके साथ ही, क्लाइमेट रिस्क स्ट्रेस टेस्टिंग का नियम भी एक स्टैंडर्ड सुपरवाइजरी जरूरत बन जाएगा।
स्ट्रक्चरल रिस्क का आकलन
इस एजेंडा की सबसे बड़ी चुनौती इम्प्लीमेंटेशन टाइमलाइन और पुराने बैंकिंग सिस्टम पर पड़ने वाला बोझ है। एक यूनिफाइड एंटरप्राइज प्लेटफॉर्म पर जाने से लॉन्ग-टर्म में एफिशिएंसी तो बढ़ेगी, लेकिन ट्रांज़िशन पीरियड में ऑपरेशनल अस्थिरता का खतरा है। छोटे और मध्यम आकार के वित्तीय संस्थान इन कॉम्प्लेक्स AI और साइबर सिक्योरिटी रेगुलेशंस को अपनाने में संघर्ष कर सकते हैं। इससे वित्तीय सेक्टर में एक तरह का विभाजन हो सकता है, जहां केवल बड़े बैंक ही नए और कड़े रेगुलेटरी स्टैंडर्ड को पूरा कर पाएंगे। इसके अलावा, इंटरेस्ट रेट रिव्यू और शेयर्ड लोन अरेंजमेंट फ्रेमवर्क जैसे नियमों से बैंकों की प्रोडक्ट प्राइसिंग और रिस्क मैनेजमेंट की फ्लेक्सिबिलिटी कम हो सकती है, जिससे इकॉनमी के कुछ सेगमेंट्स में क्रेडिट ग्रोथ धीमी पड़ सकती है।
