Reserve Bank of India (RBI) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में भारत की नेट इंटरनेशनल लायबिलिटीज (Net International Liabilities) बढ़कर **$220.3 बिलियन** हो गई हैं। विदेशी पूंजी और घरेलू संपत्तियों के बीच बढ़ते अंतर के कारण यह आंकड़ा ऊपर गया है।
अप्रैल से जून के बीच यानी वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में भारत के ग्लोबल फाइनेंशियल बैलेंस शीट में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। आरबीआई (RBI) के डेटा के अनुसार, भारत की विदेशी देनदारी और विदेशों में मौजूद घरेलू संपत्तियों के बीच का अंतर अब $220.3 बिलियन तक पहुंच गया है।
$220.3 बिलियन का गणित
इस तीन महीने की अवधि में, भारत पर गैर-निवासियों (non-residents) का दावा $16.5 बिलियन बढ़ गया है। इसकी मुख्य वजह यह रही कि भारत में विदेशी निवेश बढ़ा है, जबकि विदेश में मौजूद भारतीय संपत्तियों के मूल्य में गिरावट दर्ज की गई। नतीजतन, भारत की इंटरनेशनल एसेट्स और लायबिलिटीज का रेशियो पिछली तिमाही के 85.7% से घटकर अब 84.6% रह गया है। यह आंकड़ा देश की आर्थिक स्थिरता को समझने के लिए काफी अहम माना जाता है।
FDI बनाम पोर्टफोलियो इक्विटी का खेल
पूंजी का स्वरूप देखना भी जरूरी है। इस तिमाही में भारत को $15.7 बिलियन का डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) मिला, जिसे आमतौर पर 'लॉन्ग-टर्म' पैसा माना जाता है। वहीं, $4.2 बिलियन अन्य निवेश चैनलों से आए। हालांकि, $14 बिलियन का पोर्टफोलियो इक्विटी आउटफ्लो (बाजार से पैसा बाहर जाना) इन निवेशों पर भारी पड़ा। निवेशकों को इस बात पर गौर करना चाहिए क्योंकि पोर्टफोलियो निवेश वैश्विक मार्केट के मूड के हिसाब से तेजी से निकलते हैं।
बढ़ता कर्ज और रिस्क फैक्टर
लॉन्ग-टर्म निवेशकों के लिए सबसे बड़ा अलर्ट 'डेट' का हिस्सा है। भारत की कुल विदेशी देनदारियों में अब कर्ज (Debt) का हिस्सा 56.9% हो गया है, जो लगातार बढ़ रहा है। कर्ज का बढ़ता हिस्सा अर्थव्यवस्था को ग्लोबल ब्याज दरों और करेंसी में होने वाले उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशील बनाता है।
हालांकि, हमारे पास अभी भी 55.1% रिजर्व एसेट्स का मजबूत बफर मौजूद है, जो मुश्किल समय में सुरक्षा कवच का काम करता है। अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि सेंट्रल बैंक इन कैपिटल फ्लो को कैसे मैनेज करता है, क्योंकि इसका सीधा असर रुपये की वैल्यू और कंपनियों की फंड जुटाने की लागत पर पड़ता है।
