भारत का विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) रिकॉर्ड **$785.71 बिलियन** के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया है। जून के बाद से **$136 बिलियन** से अधिक के इनफ्लो ने इसे नई ऊंचाई दी है, लेकिन इस बढ़ोत्तरी के साथ लिक्विडिटी और इन्फ्लेशन को मैनेज करना रिजर्व बैंक (RBI) के लिए एक नई चुनौती बन गया है।
4 सितंबर, 2026 को समाप्त हुए सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार $785.71 बिलियन की नई ऊंचाई पर पहुंच गया है। इस रिकॉर्ड उछाल में एक ही हफ्ते में $44.9 बिलियन की बड़ी वृद्धि शामिल है, जो RBI द्वारा डॉलर इनफ्लो को आकर्षित करने के लिए लिए गए नीतिगत फैसलों का नतीजा है।
तेजी की असल वजह
इस भारी बढ़त के पीछे जून 2026 में शुरू की गई विशेष नीतियां हैं। इनमें कंसेशनल फॉरेक्स स्वैप फैसिलिटी और NRI डिपॉजिट्स को आकर्षित करने के लिए दिए गए इन्सेंटिव्स शामिल हैं, जिससे अब तक $136 बिलियन से अधिक का फंड आया है। हालांकि फॉरेन करेंसी एसेट्स में $47.5 बिलियन की बढ़ोतरी हुई, लेकिन सोने की वैल्यू में करीब $2.6 बिलियन की गिरावट ने कुल आंकड़े को थोड़ा प्रभावित किया है।
लिक्विडिटी और भविष्य की चिंताएं
भारी डॉलर इनफ्लो से बैंकिंग सिस्टम में रिकॉर्ड लिक्विडिटी सरप्लस हुआ है, जो ₹11 ट्रिलियन के पार चला गया है। यह अर्थव्यवस्था के लिए दोधारी तलवार जैसा है। एक तरफ यह भारतीय बाजार पर भरोसे को दर्शाता है, तो दूसरी तरफ इससे इन्फ्लेशन (महंगाई) का खतरा भी बढ़ गया है। इसे कंट्रोल करने के लिए RBI लगातार Variable Rate Reverse Repo (VRRR) ऑक्शन के जरिए सिस्टम से अतिरिक्त नकदी सोख रहा है।
निवेशकों को यह भी समझना होगा कि इनमें से बड़ा हिस्सा भविष्य की लायबिलिटी (Forward Book Liabilities) के रूप में दर्ज है। जानकारों का मानना है कि आने वाले 12 महीनों में RBI को अपनी फॉरवर्ड पोजीशन एडजस्ट करनी पड़ सकती है, जिससे रिजर्व के आंकड़े $750 बिलियन के स्तर पर सामान्य (normalize) हो सकते हैं। अब सबकी नजर इस बात पर है कि RBI कैसे इन लायबिलिटीज और बैंकिंग लिक्विडिटी के बीच संतुलन बनाता है।
