जून **2026** में भारतीय कंपनियों का विदेशी कर्ज (External Commercial Borrowings) उछलकर **$6.08 बिलियन** पहुंच गया है। घरेलू बाजार में लिक्विडिटी की कमी के चलते कंपनियां अब विदेशों से पैसा जुटा रही हैं, लेकिन यह बढ़ता कर्ज भविष्य में करेंसी रिस्क और वर्किंग कैपिटल के लिए विदेशी निर्भरता पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है।
कर्ज लेने की रफ्तार में बड़ा उछाल
भारतीय कंपनियों के लिए विदेशी फंड जुटाने का चलन तेजी से बढ़ा है। जून 2026 में यह आंकड़ा $6.08 बिलियन रहा, जो पिछले साल इसी महीने के $3.48 बिलियन के मुकाबले 74.4% की बड़ी बढ़ोतरी है। इस तेजी के पीछे घरेलू बाजार में लिक्विडिटी की तंगी और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में ब्याज दरों का अंतर मुख्य कारण है। फरवरी 2026 में हुए 'फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट' में बदलाव ने भी कंपनियों को इस दिशा में सहारा दिया है।
सरकारी कंपनियों की बड़ी भूमिका
इस ट्रेंड में सरकारी कंपनियां (PSUs) सबसे आगे हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) द्वारा 8 जून 2026 को शुरू की गई स्पेशल 'USD-INR स्वैप सुविधा' के बाद कंपनियों को विदेशी फंड जुटाना आसान हो गया है। Power Grid Corporation of India और HUDCO जैसी बड़ी कंपनियां इस सुविधा का फायदा उठा रही हैं। Power Grid ने तो अपने सालाना जनरल मीटिंग में कर्ज की सीमा बढ़ाकर ₹2.2 लाख करोड़ कर दी है।
वर्किंग कैपिटल का रिस्क
चिंता की बात यह है कि इस पैसे का इस्तेमाल लॉन्ग-टर्म प्रोजेक्ट्स के बजाय वर्किंग कैपिटल के लिए किया जा रहा है। जून 2026 में 76 कंपनियों ने वर्किंग कैपिटल के लिए कर्ज लिया, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा 49 था। यह संकेत है कि कंपनियां कैश फ्लो मैनेज करने के लिए शॉर्ट-टर्म रणनीति अपना रही हैं, जो लंबी अवधि में कंपनी की सेहत के लिए हानिकारक हो सकता है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
निवेशकों को सतर्क रहने की जरूरत है क्योंकि:
- करेंसी रिस्क: रुपये में गिरावट आने पर डॉलर में लिए गए कर्ज को चुकाना महंगा हो जाएगा, जिससे प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव आएगा।
- आय का जरिया: यदि विदेशी कर्ज का उपयोग एसेट बनाने के बजाय रोजमर्रा के खर्चों में होता है, तो भविष्य में ग्रोथ की संभावनाएं कम हो सकती हैं।
आने वाली तिमाही के रिजल्ट्स में कंपनियों की मैनेजमेंट कमेंट्री पर नजर रखें कि कितना पैसा प्रोडक्टिव एसेट्स में और कितना सिर्फ रोटेशनल खर्चों में जा रहा है।
