RBI द्वारा जारी विदेशी निवेश के ड्राफ्ट नियमों को लेकर बाजार में चिंता बढ़ गई है। अधूरे डॉक्यूमेंट्स और Rule 9 के तहत प्रस्तावित 'जॉइंट लायबिलिटी' मॉडल के कारण निवेशकों के बीच उलझन की स्थिति है, जिसे लेकर एक्सपर्ट्स ने अब रेगुलेटरी क्लैरिटी की मांग की है।
नियम और अनुपालन का बोझ (Compliance Burden)
विवाद का सबसे बड़ा केंद्र Rule 9 है। वर्तमान सिस्टम में, भारतीय कंपनियां ही ज्यादातर कंप्लायंस देखती हैं, लेकिन नए ड्राफ्ट में 'जॉइंट लायबिलिटी' मॉडल का प्रस्ताव है। इसका मतलब है कि अब विदेशी निवेशकों को भी जिम्मेदारी साझा करनी होगी। जानकारों का कहना है कि इससे लीगल और एडमिनिस्ट्रेटिव खर्च बढ़ सकते हैं, जिससे विदेशी पूंजी (Capital Inflow) के आने की रफ्तार पर बुरा असर पड़ सकता है।
पारदर्शिता और अस्पष्टता
ड्राफ्ट में FDI और फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट (FPI) के वर्गीकरण को लेकर भी काफी कन्फ्यूजन है। ड्राफ्ट में 10% से कम निवेश वाली अनलिस्टेड कंपनियों के लिए नए नियम सुझाए गए हैं, लेकिन SEBI को रिपोर्टिंग और मॉनिटरिंग के तरीकों पर स्पष्टता की कमी है। नीति में बदलाव के पीछे की ठोस वजहों (Logic) का खुलासा न होने से बड़े स्टेकहोल्डर्स भी फिलहाल असमंजस में हैं।
ग्लोबल मानकों की मांग
एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत को भी OECD देशों की तर्ज पर 'रेगुलेटरी इम्पैक्ट असेसमेंट' अपनाना चाहिए। इसमें किसी भी नए नियम को लागू करने से पहले कॉस्ट-बेनिफिट एनालिसिस किया जाता है। यूके और कनाडा जैसे देशों में रेगुलेटर को प्रस्तावित नियमों के साथ विस्तृत रिपोर्ट देनी पड़ती है, जिससे मार्केट में भरोसा बना रहता है। अब देखना यह है कि क्या सरकार इन सुझावों के बाद ड्राफ्ट में बदलाव करती है या नहीं।
