भारत के बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी का स्तर **₹11 लाख करोड़** के पार पहुंच गया है, जिसकी बड़ी वजह भारी विदेशी मुद्रा का आना है। इस सरप्लस को मैनेज करने के लिए RBI अब एक्टिव हो गया है और रिवर्स रेपो व स्वैप जैसे टूल्स का इस्तेमाल कर रहा है।
लिक्विडिटी क्यों और कैसे बढ़ी?
देश में विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने के लिए शुरू की गई स्पेशल स्वैप फैसिलिटी को जबरदस्त रिस्पॉन्स मिला है। 31 अगस्त 2026 तक, FCNR(B) डिपॉजिट के जरिए $136.4 बिलियन की विदेशी मुद्रा का इनफ्लो हुआ है, जिसने सिस्टम में नकदी का अंबार लगा दिया है। अब RBI का मुख्य लक्ष्य यह है कि शॉर्ट-टर्म इंटरेस्ट रेट्स, उनकी 5.25% की पॉलिसी रेपो रेट के साथ बने रहें।
RBI का 'क्लीनअप' ऑपरेशन
सिस्टम से एक्स्ट्रा रुपये को बाहर निकालने के लिए RBI कई हथकंडे अपना रहा है। इसमें Variable Rate Reverse Repo (VRRR) ऑक्शन, Standing Deposit Facility (SDF) और डॉलर-रुपया बाय-सेल स्वैप शामिल हैं। RBI का डर यह है कि अगर सिस्टम में बहुत ज्यादा नकदी रही, तो बैंक आपस में उधार लेने के बजाय उसे पार्क करना पसंद करेंगे, जिससे सेंट्रल बैंक का मॉनेटरी पॉलिसी पर कंट्रोल कमजोर पड़ सकता है।
क्या बैंक 'अति-उत्साह' में करेंगे लोन?
इस सरप्लस को लेकर बैंकिंग दिग्गजों के बीच मतभेद हैं। Axis Bank जैसे कुछ बैंकों को डर है कि इतनी नकदी कहीं बैंकों को 'एग्रेसिव लेंडिंग' के लिए न उकसा दे, जिससे पुराने समय के क्रेडिट रिस्क फिर से पैदा हो सकते हैं। वहीं, State Bank of India के जानकारों का मानना है कि त्योहारों के सीजन में नकदी की मांग बढ़ने से यह सरप्लस एक क्वार्टर के भीतर खुद-ब-खुद एडजस्ट हो जाएगा।
निवेशकों के लिए संकेत
फिलहाल शॉर्ट-टर्म फंडिंग कॉस्ट पर दबाव दिख रहा है। निवेशकों को अब यह देखना होगा कि क्या बैंक अपना पैसा सुरक्षित तरीके से RBI के पास रख रहे हैं, या फिर ज्यादा मुनाफे के चक्कर में रिस्की लोन बांट रहे हैं। त्योहारी सीजन में ग्राहकों द्वारा नकदी की निकासी इस लिक्विडिटी को कम करने में बड़ी भूमिका निभाएगी।
