RBI ने Indiabulls Limited को 'कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी' (CIC) के तौर पर काम करने का रजिस्ट्रेशन दे दिया है। हालांकि, कंपनी अब यह विचार कर रही है कि वह इस लाइसेंस को अपने पास रखेगी या सरेंडर कर देगी।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने Indiabulls Limited को औपचारिक रूप से एक 'कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी' (CIC) के रूप में प्रमाणित कर दिया है। इस बदलाव का सीधा मतलब है कि कंपनी अब एक खास रेगुलेटरी ढांचे के तहत काम करेगी, जिसे मुख्य रूप से ग्रुप कंपनियों में निवेश होल्ड करने के लिए बनाया गया है।
CIC होने का क्या मतलब है?
इसे आसान शब्दों में समझें: यह कोई रिटेल बैंक या आम लेंडर (Lender) नहीं है। CIC का मुख्य काम अपनी ही ग्रुप की कंपनियों में कैपिटल मैनेज करना और उन्हें फंड मुहैया कराना होता है। RBI के सख्त नियमों के अनुसार, ऐसी कंपनी को अपनी कम से कम 90% नेट एसेट्स अपने ग्रुप की सब्सिडियरी कंपनियों में निवेश या लोन के तौर पर रखनी होती है। इतना ही नहीं, इनमें से कम से कम 60% एसेट्स ग्रुप कंपनियों के इक्विटी शेयर्स के रूप में होनी चाहिए।
कंपनी के लिए इसके क्या मायने हैं?
यह रजिस्ट्रेशन कंपनी के लिए एक स्ट्रक्चरल बदलाव है। कंपनी ने साफ किया है कि इसका मतलब रिटेल लेंडिंग या किसी नए बैंकिंग बिजनेस में उतरना बिल्कुल नहीं है। पहले 'Yaari Digital Integrated Services Limited' के नाम से पहचानी जाने वाली यह कंपनी अब नए नियमों के दायरे में आ गई है।
क्या लाइसेंस सरेंडर कर देगी कंपनी?
हालांकि रजिस्ट्रेशन मिल चुका है, लेकिन कंपनी ने इसे बरकरार रखने की कोई गारंटी नहीं दी है। 2 अक्टूबर, 2026 की रेगुलेटरी फाइलिंग के मुताबिक, मैनेजमेंट अभी यह आकलन कर रहा है कि क्या CIC फ्रेमवर्क उनके लॉन्ग-टर्म बिजनेस के लिए सही है। अगर कंपनी को लगता है कि ये नियम उनके ऑपरेशन्स के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहे, तो वे इस लाइसेंस को सरेंडर भी कर सकते हैं। फिलहाल, यह एक प्रशासनिक बदलाव है और निवेशकों को कंपनी के अगले फैसले का इंतजार करना चाहिए।
