इंश्योरेंस रेगुलेटर IRDAI ने हेल्थ इंश्योरेंस में मिलने वाले भारी-भरकम कमीशन को सीमित करने का मन बना लिया है। अब इसे मौजूदा **24%** से घटाकर **15%** से **20%** के बीच लाने की तैयारी है, जिससे ग्राहकों को होने वाली बेवजह की पॉलिसी स्विचिंग (Churn) पर लगाम लग सकेगी।
बीमा क्षेत्र में बदलाव की तैयारी करते हुए IRDAI के चेयरमैन अजय सेठ ने साफ कर दिया है कि रेगुलेटर अब कंपनियों के प्राइसिंग मॉडल और डिस्ट्रीब्यूटर कमीशन दोनों की कड़ी निगरानी कर रहा है। हेल्थ इंश्योरेंस में फिलहाल औसतन 24% कमीशन दिया जा रहा है, जिसे घटाकर 15% से 20% करने पर विचार किया जा रहा है। अधिकारियों का मानना है कि इस भारी कमीशन के कारण प्रीमियम पर दबाव बढ़ता है और क्लेम सेटलमेंट के लिए कंपनियों के पास कम फंड बचता है।
ग्राहकों का 'आर्टिफिशियल चर्न' रोकना प्राथमिकता
रेगुलेटर के लिए 'चर्न' (बार-बार इंश्योरेंस कंपनी बदलना) एक बड़ी चिंता का विषय है। डेटा के अनुसार, 2024-25 के दौरान पोर्टेबिलिटी के जरिए होने वाले स्विच में से 60% हिस्सा केवल 3 कंपनियों ने हासिल किया, जबकि 90% स्विच सिर्फ 7 बीमा कंपनियों के पास गए। IRDAI का मानना है कि डिस्ट्रीब्यूटर्स ज्यादा कमीशन के लालच में ग्राहकों को बार-बार पॉलिसी बदलने के लिए मजबूर कर रहे हैं, जो ग्राहकों के हित में नहीं है।
इसके समाधान के लिए रेगुलेटर नई पॉलिसी और रिन्यूअल के कमीशन को समान स्तर पर लाने की योजना बना रहा है।
डायनामिक प्राइसिंग पर सवाल
सिर्फ कमीशन ही नहीं, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स द्वारा अपनाए जा रहे 'डायनामिक प्राइसिंग' मॉडल पर भी IRDAI ने कड़ा रुख अपनाया है। एविएशन सेक्टर की तरह बीमा में एल्गोरिदम से कीमतों को बार-बार बदलना और डेटा हार्वेस्टिंग करना रेगुलेटर को रास नहीं आ रहा है। वे चाहते हैं कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स कीमतों में पूरी पारदर्शिता बरतें।
निवेशकों के लिए क्या है मतलब?
अगर कमीशन कैप लागू होता है, तो इंश्योरेंस कंपनियों की अधिग्रहण लागत (Acquisition Cost) कम हो सकती है, जिससे लंबी अवधि में उनका प्रॉफिट मार्जिन बेहतर होने की उम्मीद है। हालांकि, कंपनियों की चुनौती यह होगी कि क्या वे बिना उच्च-इंसेंटिव मॉडल के अपनी सेल्स ग्रोथ बरकरार रख पाती हैं या नहीं।
