Rupee Defense: RBI को IMF की सलाह, रुपये की रक्षा कम करे सेंट्रल बैंक

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AuthorMehul Desai|Published at:
Rupee Defense: RBI को IMF की सलाह, रुपये की रक्षा कम करे सेंट्रल बैंक

International Monetary Fund (IMF) ने Reserve Bank of India (RBI) को सुझाव दिया है कि वह रुपये की गिरावट को रोकने के लिए बाजार में दखलंदाजी कम करे। ग्लोबल लेंडर का मानना है कि रुपये को बाजार के अनुसार खुद को ढालने देने से इकोनॉमिक झटकों से बेहतर तरीके से निपटा जा सकता है।

International Monetary Fund (IMF) की ओर से भारतीय रिजर्व बैंक की करेंसी मैनेजमेंट स्ट्रैटेजी पर एक बड़ा सुझाव सामने आया है। IMF का कहना है कि RBI को रुपये को सहारा देने के लिए अपने विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) को बेचने के बजाय, इसे ग्लोबल मार्केट की स्थितियों के हिसाब से फ्लोट (float) होने देना चाहिए।

क्यों चाहता है IMF 'फ्लोटिंग रुपया'?

IMF का तर्क है कि एक्सचेंज रेट को एक 'शॉक एब्जॉर्बर' की तरह काम करना चाहिए। जब ग्लोबल लेवल पर क्रूड ऑयल या अन्य कमोडिटी के दाम बदलते हैं, तो करेंसी की वैल्यू को प्राकृतिक रूप से एडजस्ट होने देना विदेशी भंडार को फालतू में खर्च करने से कहीं ज्यादा बेहतर है। अभी स्थिति यह है कि रुपया गिरने पर RBI डॉलर बेचकर बाजार में दखल देता है, जिससे देश का कीमती रिजर्व कम हो रहा है।

महंगाई और आयात पर क्या होगा असर?

यह रणनीति लचीलापन तो देती है, लेकिन भारत जैसे देश के लिए जोखिम भी है। अगर रुपया बिना किसी रोक-टोक के गिरता है, तो कच्चे तेल और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे सामानों का आयात महंगा हो जाएगा, जिससे घरेलू बाजार में महंगाई बढ़ सकती है। IMF का सुझाव है कि अगर ऐसी स्थिति आती है, तो RBI को करेंसी में हस्तक्षेप करने के बजाय 'मॉनेटरी पॉलिसी' (Monetary Policy) का सहारा लेना चाहिए। यानी, महंगाई रोकने के लिए ब्याज दरों (Interest Rates) में बदलाव करना ज्यादा कारगर तरीका हो सकता है।

बिजनेस और निवेशकों के लिए क्या है संकेत?

इंपोर्ट करने वाले सेक्टर जैसे ऑटो मैन्युफैक्चरिंग, ऑयल मार्केटिंग और कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए यह एक बड़ी चुनौती हो सकती है, क्योंकि डॉलर के मुकाबले रुपये में उतार-चढ़ाव उनके प्रॉफिट मार्जिन को सीधा प्रभावित करेगा। वहीं, आईटी और फार्मा जैसे एक्सपोर्ट ओरिएंटेड सेक्टर के लिए एक फ्लेक्सिबल रुपया सामान्य बाजार स्थिति जैसा ही है।

आने वाले समय में RBI की पॉलिसी मीटिंग्स पर निवेशकों की कड़ी नजर रहेगी कि क्या बैंक अपनी पुरानी नीति पर कायम रहता है या ग्लोबल लेंडर की सलाह पर चलकर ज्यादा 'हैंड्स-ऑफ' एप्रोच अपनाता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.