RBI के पूर्व डिप्टी गवर्नर Michael Debabrata Patra ने भारतीय रुपये को ग्लोबल झटकों के बीच फ्री-फ्लोट छोड़ने के खिलाफ चेतावनी दी है। उनके मुताबिक, बाजार की सट्टेबाजी रुपये को अनावश्यक रूप से गिरा सकती है, जिसका सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
भारत अपनी करेंसी को किस तरह मैनेज करे, इस पर छिड़ी बहस के बीच RBI के पूर्व डिप्टी गवर्नर Michael Debabrata Patra ने एक अहम बयान दिया है। उन्होंने उस आर्थिक सिद्धांत को चुनौती दी है जो यह कहता है कि ग्लोबल मार्केट के झटकों से निपटने के लिए करेंसी को डॉलर के मुकाबले फ्री-फ्लोट छोड़ देना चाहिए। यह चर्चा भारतीय निवेशकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि रुपये की चाल सीधे तौर पर महंगाई, कंपनियों की इम्पोर्ट कॉस्ट और ब्याज दरों के फैसलों को प्रभावित करती है।
क्यों खतरनाक है 'फ्री-फ्लोट'?
करेंसी को पूरी तरह बाजार के भरोसे छोड़ने के खिलाफ सबसे बड़ा तर्क 'overshooting' का जोखिम है। जब बाजार का सेंटीमेंट या सट्टेबाजी किसी करेंसी को उसके फंडामेंटल वैल्यू से काफी नीचे गिरा देती है, तो उसे 'overshooting' कहते हैं। भारत जैसा देश, जो बड़े पैमाने पर तेल और कच्चे माल का आयात करता है, वहां अचानक रुपये में बड़ी गिरावट से 'imported inflation' यानी आयातित महंगाई बढ़ जाती है। इसका सीधा असर मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के मुनाफे पर और आम आदमी की रसोई के बजट पर पड़ता है।
RBI का 'मैनेज्ड फ्लोट' सिस्टम
RBI ने हमेशा से 'मैनेज्ड फ्लोट' सिस्टम को प्राथमिकता दी है। केंद्रीय बैंक बाजार को पूरी छूट देने के बजाय डॉलर की खरीद-बिक्री के जरिए उतार-चढ़ाव को कंट्रोल करता है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, रुपये की वोलेटिलिटी को 5% के आसपास सीमित रखा गया है, जो इस क्षेत्र की अन्य अर्थव्यवस्थाओं के बराबर है। यह सुरक्षा उपाय घरेलू बाजार में पैनिक को रोकने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
निवेशकों के लिए संकेत
निवेशकों के लिए केंद्रीय बैंक का संचार (communication) भी उतना ही जरूरी है जितना कि बाजार में सीधा दखल। मौजूदा समय में Monetary Policy Committee के सामने दोहरी चुनौती है—एक तरफ करेंसी की स्थिरता और दूसरी तरफ आर्थिक विकास। अगर केंद्रीय बैंक करेंसी बचाने के लिए ब्याज दरों को बहुत ज्यादा बढ़ाता है, तो इससे कंपनियों के लिए लोन लेना और विस्तार करना महंगा हो सकता है। आने वाले समय में निवेशकों को RBI के विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) मैनेजमेंट पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि केंद्रीय बैंक अपनी रिजर्व का इस्तेमाल तेल कंपनियों की डॉलर मांग को पूरा करने के लिए कर रहा है ताकि बाजार में तनाव कम रहे।
