पूर्व RBI गवर्नर D Subbarao ने रुपये को संभालने के लिए अपनाए जा रहे शॉर्ट-टर्म उपायों पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि केंद्रीय बैंक के ये कदम केवल लक्षणों का इलाज कर रहे हैं, जबकि असली समस्या का समाधान स्ट्रक्चरल रिफॉर्म्स में है।
पूर्व RBI गवर्नर D Subbarao ने रुपये की वैल्यू को मैनेज करने की हालिया स्ट्रैटेजी की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने कहा है कि डेरिवेटिव नियमों को सख्त करना या ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के लिए डॉलर विंडो खोलना जैसे कदम करेंसी की गिरावट की मूल समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं हैं। सुब्बाराव के मुताबिक, ये उपाय बाजार के दबाव से निपटने के लिए केवल एक अस्थायी ढाल हैं।
असली चुनौती और कैपिटल आउटफ्लो
सुब्बाराव का तर्क है कि केंद्रीय बैंक का ध्यान अक्सर तात्कालिक मुद्दों पर होता है, जैसे ऑयल इम्पोर्ट बिल का बोझ कम करना। हालांकि ये कदम बाजार को कुछ समय के लिए शांत कर सकते हैं, लेकिन ये उन गहरी समस्याओं को नजरअंदाज करते हैं जो रुपये में कमजोरी पैदा कर रही हैं। उन्होंने साफ किया कि असली चुनौती कैपिटल आउटफ्लो की है, जहां पैसा भारतीय बाजार से बाहर जा रहा है, न कि केवल इम्पोर्ट पेमेंट का दबाव।
क्यों जरूरी है टैक्स रिफॉर्म्स?
पूर्व गवर्नर का मानना है कि लॉन्ग-टर्म विदेशी पूंजी को आकर्षित करने के लिए टैक्स कानूनों में स्थिरता जरूरी है। उन्होंने नोट किया कि भारत में टैक्स नियमों की अनिश्चितता अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को हतोत्साहित करती है। जब नियम स्पष्ट नहीं होते, तो विदेशी निवेशक लॉन्ग-टर्म निवेश से कतराते हैं, जिसका सीधा असर करेंसी की स्टेबिलिटी पर पड़ता है।
निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?
रुपये में उतार-चढ़ाव का असर शेयर बाजार के अलग-अलग सेक्टर पर पड़ता है। जो कंपनियां इम्पोर्ट पर निर्भर हैं, जैसे ऑटो कंपोनेंट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑयल मार्केटिंग फर्म, उनके लिए डॉलर के मुकाबले रुपया गिरने से लागत बढ़ जाती है। वहीं, एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड कंपनियां जैसे IT सर्विस और फार्मास्युटिकल सेक्टर को इसका फायदा मिल सकता है क्योंकि उनकी कमाई विदेशी करेंसी में होती है। सुब्बाराव के ये बयान संकेत देते हैं कि निवेशकों को आने वाले समय में RBI की पॉलिसी और सरकारी टैक्स सुधारों पर नजर बनाए रखने की जरूरत है।
