भारतीय बैंकिंग सिस्टम में नकदी का अंबार लग गया है। विदेशी मुद्रा प्रवाह के चलते सिस्टम में लिक्विडिटी रिकॉर्ड **₹10.3 लाख करोड़** के स्तर पर पहुंच गई है, जिससे शॉर्ट-टर्म ब्याज दरें RBI के तय दायरे से भी नीचे फिसल गई हैं।
भारतीय बैंकिंग सिस्टम में इस वक्त कैश की बंपर सप्लाई देखी जा रही है। 3 सितंबर, 2026 तक सिस्टम में सरप्लस लिक्विडिटी ₹10.3 लाख करोड़ के ऐतिहासिक उच्च स्तर पर पहुंच गई है। इस सरप्लस कैश की वजह से शॉर्ट-टर्म ब्याज दरों को मैनेज करना रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।
ब्याज दरों पर दबाव
इस भारी लिक्विडिटी का असर बाजार की दरों पर दिखने लगा है। 4 सितंबर को ओवरनाइट वेटेड एवरेज कॉल रेट (WACR) गिरकर 4.94% पर आ गया। यह आंकड़ा इसलिए अहम है क्योंकि यह RBI की स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी (SDF) रेट यानी 5% के फ्लोर से भी नीचे चला गया है।
क्यों आया है इतना कैश?
यह सारा कैश RBI की स्पेशल फॉरेन करेंसी डिपॉजिट स्कीम, खासकर FCNR(B) विंडो के कारण आया है। अगस्त के अंत तक कुल इनफ्लो $136 बिलियन को पार कर चुका है। जब RBI विदेशी मुद्रा खरीदती है, तो बदले में सिस्टम में उतनी ही मात्रा में रुपया रिलीज करती है, जिससे लिक्विडिटी का स्तर इतना बढ़ गया है।
क्या है RBI की अगली चाल?
RBI इस अतिरिक्त नकदी को सोखने के लिए वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) ऑक्शन का सहारा ले रही है। हालांकि, हालिया ऑक्शन में ₹8.5 लाख करोड़ के लक्ष्य के मुकाबले बैंकों ने सिर्फ ₹6.02 लाख करोड़ ही पार्क किए। यह सुस्त रिस्पॉन्स बताता है कि मौजूदा टूल्स इस विशाल लिक्विडिटी को संभालने में नाकाफी साबित हो रहे हैं।
निवेशकों के लिए क्या हैं संकेत?
बाजार के जानकारों का मानना है कि यदि लिक्विडिटी कम नहीं हुई, तो यह महंगाई को बढ़ावा दे सकती है। इसे नियंत्रित करने के लिए RBI जल्द ही कोई बड़ा कदम उठा सकता है, जैसे इंक्रीमेंटल कैश रिजर्व रेशियो (ICRR) में बढ़ोतरी या फिर ओपन मार्केट में बॉन्ड की बिक्री। निवेशकों की नजर अब RBI के अगले फैसलों पर है, क्योंकि लिक्विडिटी कम करने के किसी भी कड़े कदम का असर शॉर्ट-टर्म डेट यील्ड पर पड़ सकता है।
