देश के 10-साल के बेंचमार्क सरकारी बॉन्ड की यील्ड शुक्रवार को **7.31%** के तीन साल के उच्च स्तर पर पहुंच गई है। RBI के सख्त रुख और बाजार से लिक्विडिटी खींचने की तैयारी के चलते अब कंपनियों के लिए कर्ज लेना और महंगा हो सकता है।
भारतीय बॉन्ड मार्केट में शुक्रवार को बड़ी हलचल देखने को मिली, जब 10-साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड बढ़कर 7.31% हो गई। यह 7 अक्टूबर 2026 को RBI द्वारा रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी कर इसे 5.50% करने के बाद का सबसे बड़ा असर है।
लिक्विडिटी खींचने का असर
इस तेजी की मुख्य वजह RBI की 'कैलिब्रेटेड टाइटनिंग' पॉलिसी है। महंगाई को काबू में करने के लिए RBI बैंकिंग सिस्टम से अतिरिक्त नकदी को बाहर निकालने की तैयारी कर रहा है। 13 अक्टूबर को होने वाले ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO) के जरिए बाजार से करीब ₹1 लाख करोड़ की नकदी खींचे जाने का अनुमान है। बाजार का नियम है कि जब सिस्टम में नकदी कम होती है, तो फंड की लागत बढ़ जाती है, जिसका सीधा असर बॉन्ड यील्ड पर पड़ता है।
बैंकों पर बढ़ेगा दबाव
यह ट्रेंड बैंकों के लिए एक मुश्किल दौर लेकर आया है। भारतीय बैंकों के एसेट पोर्टफोलियो का एक बड़ा हिस्सा सरकारी बॉन्ड में निवेशित होता है। जैसे-जैसे यील्ड ऊपर जाती है, पुराने बॉन्ड्स की कीमतें नीचे गिरती हैं। इसका मतलब है कि बैंकों को अपने निवेश की वैल्यू कम करनी होगी, जिससे उनके फाइनेंशियल रिजल्ट्स पर बुरा असर पड़ सकता है और ट्रेजरी इनकम घट सकती है।
कंपनियों और आम ग्राहकों पर असर
10-साल की यील्ड का असर केवल सरकारी बॉन्ड्स तक सीमित नहीं रहता। बैंक इसी को बेंचमार्क मानकर कॉर्पोरेट लोन और लंबी अवधि के कंज्यूमर लोन की ब्याज दरें तय करते हैं। यील्ड के ऊंचे रहने का सीधा मतलब है कि कंपनियों के लिए विस्तार की योजनाएं महंगी हो जाएंगी और आम ग्राहकों के लिए लोन की EMI का बोझ भी बढ़ सकता है।
अब बाजार की निगाहें महंगाई के आंकड़ों और अगली पॉलिसी गाइडेंस पर टिकी हैं। एनालिस्ट्स का मानना है कि अब यील्ड का अगला बड़ा स्तर 7.5% हो सकता है।
