Indian Railways ने अपनी हाई-स्पीड ट्रैक क्षमता को **24,000 किमी** के पार पहुंचा दिया है, जो **2014** के मुकाबले एक बड़ा बदलाव है। लेकिन भारी इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च के बावजूद ट्रेनों की पंचुअलिटी (समयबद्धता) अभी भी **77%** के इर्द-गिर्द बनी हुई है, जो लॉजिस्टिक्स के लिए एक बड़ी चुनौती है।
भारतीय रेलवे ने अपने नेटवर्क को तेजी से आधुनिक बनाने का काम किया है। डेटा के अनुसार, 130 किमी प्रति घंटा या उससे अधिक की रफ्तार झेलने वाले ट्रैक की लंबाई 2014 में 5,036 किमी थी, जो अगस्त 2026 तक बढ़कर 24,173 किमी हो गई है। इसका मतलब है कि अब पूरे नेटवर्क का लगभग 23% हिस्सा हाई-स्पीड मानकों को पूरा करता है, जबकि एक दशक पहले यह सिर्फ 6% था।
ऑपरेशन्स में सुधार की कमी
इन्फ्रास्ट्रक्चर के बेहतर होने के बावजूद ट्रेनों के समय पर पहुंचने का रिकॉर्ड वैसा नहीं सुधरा है। फरवरी 2026 तक समाप्त हुए फाइनेंशियल ईयर के आंकड़ों के मुताबिक, पंचुअलिटी 77.24% रही, जो 2023-24 के 73.62% से मामूली सुधार ही है। केवल तीन रेलवे ज़ोन ही ऐसे हैं जो 90% से ज्यादा का पंचुअलिटी रेट बरकरार रख पाए हैं। निवेशकों के लिए यह एक अहम चिंता का विषय है, क्योंकि रेल ट्रांसपोर्ट में देरी का सीधा असर स्टील, सीमेंट और कोल जैसे सेक्टर की लॉजिस्टिक्स कॉस्ट और इन्वेंट्री साइकिल पर पड़ता है।
क्यों आ रही है रुकावट?
रेलवे हर दिन 25,000 सेवाओं का संचालन करता है, जिसमें पैसेंजर और फ्रेट ट्रेनें एक ही ट्रैक का इस्तेमाल करती हैं। वंदे भारत जैसी तेज ट्रेनों के बावजूद, सिग्नलिंग की कमी, रूट फेंसिंग का अभाव और अक्सर होने वाली बाधाएं (जैसे मवेशियों का आना या चेन पुलिंग) शेड्यूल को बिगाड़ देती हैं।
डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC) से उम्मीदें
रेलवे की परफॉर्मेंस में सुधार अब बड़े विस्तार प्रोजेक्ट्स पर निर्भर है। डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC) का काम पूरा होने से मालगाड़ियों और यात्री ट्रेनों का रूट अलग हो जाएगा, जिससे बॉटलनेक की समस्या कम होने की उम्मीद है। मल्टी-ट्रैकिंग प्रोजेक्ट्स भी भविष्य में पंचुअलिटी सुधारने के मुख्य ड्राइवर होंगे। निवेशक अब इन कॉरिडोर के चालू होने की टाइमलाइन पर नजर रख रहे हैं ताकि यह देखा जा सके कि भारी-भरकम पूंजी निवेश का फायदा नेटवर्क की दक्षता में कब तक दिखेगा।
