Indian Railways अपनी हाइड्रोजन ट्रेनों की कमर्शियल स्पीड को बढ़ाकर **110 किमी प्रति घंटा** करने की तैयारी में है। हालांकि रेलवे सरकारी संस्था है, लेकिन इस प्रोजेक्ट से जुड़ी प्राइवेट कंपनियों के लिए बड़े अवसर पैदा हो रहे हैं।
हाई-स्पीड ट्रायल की सफलता
Indian Railways अब अपने हाइड्रोजन ट्रेनसेट की क्षमता को अपग्रेड कर रहा है। हाल ही में हुए सफल ट्रायल्स में इन ट्रेनों ने 120 किमी प्रति घंटा की रफ्तार छुई थी, जिसके बाद अब इन्हें 110 किमी प्रति घंटा की सस्टेंड कमर्शियल स्पीड पर चलाने का लक्ष्य तय किया गया है। यह वर्तमान में जींद-सोनीपत रूट पर चल रही 75 किमी प्रति घंटा की रफ्तार के मुकाबले एक बड़ा उछाल है।
इको-फ्रेंडली तकनीक का जोर
ये ट्रेनें हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की रासायनिक प्रक्रिया से ऊर्जा पैदा करती हैं, जिसमें पानी के अलावा कोई उत्सर्जन नहीं होता। यह 'National Green Hydrogen Mission' का एक मुख्य हिस्सा है, जिसका लक्ष्य रेलवे के कार्बन फुटप्रिंट को कम करना है।
प्राइवेट सेक्टर के लिए अवसर
रेलवे खुद लिस्टेड नहीं है, लेकिन इसके आधुनिकीकरण का सीधा फायदा प्राइवेट वेंडर्स को मिल रहा है। प्रोपल्शन टेक्नोलॉजी में Medha Servo Drives एक अहम पार्टनर है, वहीं कोच बॉडी के लिए Jindal Stainless ने करीब 40% स्टेनलेस स्टील की आपूर्ति की है। निवेशक अक्सर इन प्रोजेक्ट्स पर नजर रखते हैं ताकि उन्हें Vande Bharat जैसी ट्रेनों के लिए ऑर्डर पाइपलाइन का अंदाजा लग सके।
चुनौतियां अभी बाकी हैं
प्रगति के बावजूद, हाइड्रोजन टेक्नोलॉजी के सामने कुछ बड़े रोड़े हैं। फ्यूल सेल टेक्नोलॉजी की ऊंची लागत और देश में हाइड्रोजन रिफिलिंग स्टेशनों का अभाव फिलहाल सबसे बड़ी बाधा है। इसके अलावा, हाइड्रोजन के उत्पादन से लेकर इस्तेमाल तक की एनर्जी एफिशिएंसी भी एक अहम मुद्दा है। आने वाले समय में बाजार इस बात पर नजर रखेगा कि कैसे सरकार और प्राइवेट कंपनियां इस इंफ्रास्ट्रक्चर की दिक्कतों को पार कर बड़े पैमाने पर कमर्शियल रोलआउट करती हैं।
