Indian Railways ने प्राइवेट फंडिंग जुटाने के लिए नए 'Hybrid Annuity' और 'Development Partner' मॉडल को अपनाया है। ₹2.62 लाख करोड़ की इस योजना से इंफ्रा सेक्टर की बड़ी कंपनियों के लिए बिडिंग के नए दरवाजे खुलेंगे।
बड़े बदलाव की तैयारी
Indian Railways ने 'नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन 2.0' के तहत एक नया फंड जुटाने का रोडमैप तैयार किया है। इसका मकसद पारंपरिक EPC कॉन्ट्रैक्ट्स से हटकर ऐसे मॉडल्स पर काम करना है, जिससे प्राइवेट सेक्टर को रेलवे प्रोजेक्ट्स में निवेश के लिए आकर्षित किया जा सके।
क्या है नया हाइब्रिड मॉडल?
इस नए ढांचे के तहत, सड़क परिवहन की तर्ज पर अब रेलवे में भी Hybrid Annuity Model (HAM) लागू होगा। इसमें सरकार प्रोजेक्ट की कुल लागत का 40% हिस्सा पहले ही वहन करेगी, जबकि बाकी 60% फंड प्राइवेट पार्टनर को जुटाना होगा। अच्छी बात यह है कि ट्रैफिक और टैरिफ का रिस्क सरकार खुद उठाएगी, जिससे प्राइवेट कंपनियों के लिए जोखिम काफी कम हो जाएगा। 'पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप अप्रेजल कमेटी' ने पहले ही ₹31,814 करोड़ के 6 बड़े रेल प्रोजेक्ट्स के लिए इस फ्रेमवर्क को मंजूरी दे दी है।
किन कंपनियों पर होगी नजर?
यह बदलाव कंस्ट्रक्शन और इंफ्रा सेक्टर की लिस्टेड कंपनियों के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है। Larsen & Toubro, KEC International, Rail Vikas Nigam Limited (RVNL) और IRCON International जैसी दिग्गज कंपनियां इन नए टेंडर्स में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं। स्टेशन रीडेवलपमेंट और कार्गो टर्मिनल बनाने वाली फर्मों के लिए भी यह एक बड़ा अवसर है।
रिस्क फैक्टर और चुनौतियां
निवेशकों को यह ध्यान रखना होगा कि रोड प्रोजेक्ट्स के मुकाबले रेलवे का काम ज्यादा जटिल है। सिग्नलिंग, सेफ्टी और नेटवर्क सिंक्रोनाइजेशन जैसे मुद्दों पर सरकार का कंट्रोल बना रहेगा। इसके अलावा, लैंड एक्विजिशन (भूमि अधिग्रहण) में देरी और सरकारी बजट पर लंबे समय तक चलने वाले 'एन्युटी पेमेंट्स' का दबाव इस योजना की सफलता के लिए बड़ी चुनौतियां बन सकते हैं। बाजार अब इन प्रोजेक्ट्स के पहले टेंडर और 50 साल तक की लंबी अवधि वाली रियायती शर्तों (Concession Terms) पर कड़ी नजर रखेगा।
