भारतीय रेलवे ने अपने ब्रॉड-गेज नेटवर्क का **99.6%** बिजलीकरण पूरा कर लिया है और **2015** से डीजल की खपत में **63%** की कमी आई है। हालांकि, ग्रिड फेल्योर और शंटिंग जैसी जरूरतों के लिए रेलवे अभी भी **2,500** डीजल इंजनों को बैकअप के रूप में रख रहा है, जिसका सीधा असर इसके ऑपरेशनल खर्चों पर पड़ता है।
भारतीय रेलवे ने एक बड़ा मील का पत्थर हासिल कर लिया है, जिसमें ब्रॉड-गेज नेटवर्क का 99.6% हिस्सा अब इलेक्ट्रिक हो चुका है। इससे 2015 के बाद से रेलवे की डीजल खपत में 63% की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि, पूरी तरह से डीजल मुक्त होना अभी संभव नहीं है, क्योंकि सिस्टम को सुचारू बनाए रखने के लिए करीब 2,500 डीजल लोकोमोटिव की जरूरत बनी हुई है।
ऑपरेशनल सुरक्षा (Operational Insurance)
इलेक्ट्रिक ट्रेनें पूरी तरह से ओवरहेड लाइनों पर निर्भर हैं। अगर ग्रिड में कोई समस्या आती है या खराब मौसम के कारण बिजली की आपूर्ति बाधित होती है, तो डीजल इंजन ही एकमात्र सहारा बचते हैं। ये इंजन न केवल आपातकालीन स्थिति में यात्री और माल ढुलाई सेवाओं को जारी रखते हैं, बल्कि रेलवे यार्ड में शंटिंग और कालका-शिमला जैसे दुर्गम हेरिटेज रूटों के लिए भी अपरिहार्य हैं।
मार्केट और फाइनेंशियल्स का गणित
रेलवे का ऑपरेटिंग रेशियो अक्सर 98.4% के आसपास रहता है, और दो अलग-अलग एनर्जी सिस्टम को एक साथ बनाए रखना इस खर्च को और बढ़ाता है। IRFC, RVNL, IRCON और RITES जैसे रेलवे PSU शेयरों में हाल ही में आई गिरावट का मुख्य कारण बाजार द्वारा वैल्युएशन का पुनर्मूल्यांकन (re-evaluation) है, क्योंकि निवेशक अब इन कंपनियों के बढ़ते ऑर्डर बुक के साथ-साथ वास्तविक मुनाफे को देख रहे हैं।
भविष्य की ग्रीन रणनीति
रेलवे का लक्ष्य 2030 तक नेट-जीरो एमिशन हासिल करना है। इसके लिए LNG-डुअल फ्यूल, बैटरी और हाइड्रोजन से चलने वाले इंजनों पर तेजी से काम हो रहा है। निवेशकों को यह नजर रखनी होगी कि रेलवे ग्रीन एनर्जी पर खर्च और अपने ऑपरेशनल कॉस्ट को कैसे मैनेज करता है, क्योंकि यही आने वाले समय में इन कंपनियों की स्टॉक परफॉरमेंस तय करेगा।
