ट्रैक पर टेक्नोलॉजी का नया अवतार
रेल मंत्रालय (Ministry of Railways) ने भारत की पहली हाइड्रोजन से चलने वाली 10-कोच वाली डीज़ल इलेक्ट्रिक मल्टीपल यूनिट (DEMU) ट्रेन को हरी झंडी दे दी है। यह ट्रेन हाइड्रोजन फ्यूल सेल से बिजली बनाती है, जिससे केवल पानी और भाप निकलती है। यह डिस्ट्रिब्यूटेड पावर रोलिंग स्टॉक (DPRS) तकनीक का उपयोग करती है, जो ट्रेन के इंजन की जगह पावर जनरेशन को पूरे ट्रेन में फैला देती है। रिसर्च डिज़ाइन्स एंड स्टैंडर्ड्स ऑर्गनाइजेशन (Research Designs and Standards Organisation) और कमिश्नर ऑफ रेलवे सेफ्टी (Commissioner of Railway Safety) द्वारा सुरक्षा और तकनीकी समीक्षा के बाद यह मंजूरी दी गई है। हालांकि, यात्री सेवाएं अभी भी विस्तृत रखरखाव (Maintenance) और सुरक्षा ऑडिट जैसे अन्य अप्रूवल के इंतज़ार में हैं।
सस्टेनेबल मोबिलिटी के सामने आर्थिक बाधाएं
जहां इस पहल को ग्रीन ट्रांसपोर्ट (Green Transport) की दिशा में एक अहम कदम बताया जा रहा है, वहीं प्रोजेक्ट आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। इंडियन रेलवेज़ ने अपने ब्रॉड-गेज नेटवर्क का 99% से ज़्यादा विद्युतीकरण (Electrification) पूरा कर लिया है, जो हाइड्रोजन की तुलना में ज़्यादा किफायती और कुशल समाधान है। विश्लेषकों का कहना है कि इस पायलट प्रोजेक्ट के लिए ₹111.83 करोड़ का भारी निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर, मौजूदा इलेक्ट्रिक ग्रिड की दक्षता के मुकाबले कम है। Jind में एक खास हाइड्रोजन प्लांट, जो 1 MW PEM इलेक्ट्रोलाइज़र का उपयोग करता है, इस स्थानीय प्रयोग को सपोर्ट करेगा। ग्रीन हाइड्रोजन की मौजूदा ज़्यादा कीमत, जो ऊर्जा की प्रति यूनिट के हिसाब से डीज़ल से काफी ज़्यादा है, बिना सरकारी सब्सिडी के इस तकनीक को बड़े पैमाने पर अपनाने पर सवाल खड़े करती है।
वित्तीय स्थिरता पर सवाल?
प्रोजेक्ट की लंबी अवधि की वित्तीय व्यवहार्यता (Financial Viability) एक बड़ी चिंता का विषय है। इंडियन रेलवेज़ एक तंग बजट पर काम कर रहा है (FY 2025-26 के लिए अनुमानित ऑपरेटिंग रेशियो 98.43%), ऐसे में महंगे नए ईंधन में निवेश करना चुनौतीपूर्ण है। आलोचकों का सुझाव है कि विद्युतीकरण के आखिरी 1% को पूरा करने के बजाय हाइड्रोजन पर ध्यान केंद्रित करना शायद सीमित धन का सबसे अच्छा उपयोग न हो। परिचालन संबंधी जोखिम (Operational Risks) भी हैं, जिसमें Shakurbasti डिपो में विशेष रखरखाव की ज़रूरत और ऑफ-साइट रखरखाव के दौरान ट्रेन को ले जाने के लिए डीज़ल लोकोमोटिव पर निर्भरता शामिल है। एडवांस्ड लीक और फ्लेम डिटेक्शन सेंसर परिचालन संबंधी जटिलताओं को और बढ़ाते हैं, जो पारंपरिक इलेक्ट्रिक सिस्टम में मौजूद नहीं हैं।
आगे का रास्ता
इन बाधाओं के बावजूद, "हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज" (Hydrogen for Heritage) पहल एक हाई-प्रोफाइल प्रोजेक्ट है, जिसमें ऐसे 35 और ट्रेनसेट की योजना है। Jind-Sonipat ट्रायल यह तय करने में महत्वपूर्ण होगा कि क्या हाइड्रोजन ट्रेनें प्रायोगिक उपयोग से आगे बढ़ सकती हैं। सफलता ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन की दक्षता में सुधार और लागत-प्रतिस्पर्धा (Cost-Competitiveness) पर निर्भर करेगी, क्योंकि भारत अपने नेट-जीरो 2030 लक्ष्यों को पूरा करने की ओर अग्रसर है।
