Railway Board ने अपने सभी जोन्स को आदेश दिया है कि टेंडर डॉक्युमेंट्स में किसी खास ब्रांड का नाम इस्तेमाल न करें। अब खरीदारी सिर्फ जेनेरिक स्पेसिफिकेशन्स और Bureau of Indian Standards के नियमों के आधार पर होगी, ताकि मोनोपोली खत्म हो सके।
रेलवे बोर्ड ने अपने सभी जोन्स और प्रोडक्शन यूनिट्स के लिए एक कड़ा निर्देश जारी किया है, जिसके तहत अब टेंडर में किसी भी ब्रांड का नाम लिखने पर पूरी तरह बैन लगा दिया गया है। इस बदलाव का मकसद उन पुरानी प्रथाओं को खत्म करना है, जहां टेक्निकल शर्तों को इस तरह रखा जाता था कि चुनिंदा कंपनियों को ही फायदा मिले। अब रेलवे केवल Bureau of Indian Standards (BIS) के तय मानकों पर आधारित जेनेरिक प्रोडक्ट डिस्क्रिप्शन का उपयोग करेगा।
पारदर्शिता और कंपटीशन की ओर कदम
सालों से कई टेंडर्स में टेक्निकल स्पेसिफिकेशन को घुमा-फिरा कर ऐसे लिखा जाता था, जिससे केवल कुछ ही कंपनियां बिडिंग (Bidding) कर पाती थीं। सरकार अब सरकारी खर्च में पारदर्शिता लाने पर जोर दे रही है। विजिलेंस जांच में रेलवे की यूनिफॉर्म और जैकेट्स जैसी खरीदारी में अनियमितताएं सामने आई थीं, जिसके बाद यह बड़ा कदम उठाया गया है।
₹2.93 लाख करोड़ का खर्च और चुनौतियां
रेलवे का बजट कोई छोटा नहीं है। फाइनेंशियल ईयर 2026-27 के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर और एसेट्स पर ₹2.93 लाख करोड़ खर्च करने की योजना है। रेलवे के पास 242,000 से ज्यादा तरह के आइटम्स हैं, जिन्हें 306 डिपो के जरिए मैनेज किया जाता है। खरीदारी का 73% हिस्सा अलग-अलग जोनल यूनिट्स के हाथ में है, ऐसे में एक समान नियम लागू करना एक बड़ी चुनौती है।
निवेशकों और वेंडर्स पर क्या असर होगा?
जो कंपनियां पहले 'ब्रांड स्पेसिफिक' होने के कारण एकाधिकार का आनंद ले रही थीं, अब उन्हें कड़ी प्रतिस्पर्धा (Competition) का सामना करना पड़ेगा। इससे उनके मुनाफे पर दबाव आ सकता है। हालांकि, जो नए वेंडर्स तकनीकी मानकों को पूरा करते हैं, उनके लिए अब बाजार के दरवाजे खुल गए हैं।
निवेशकों को इस बात पर नजर रखनी होगी कि क्या इन नए नियमों से क्वालिटी और सुरक्षा के स्तर पर कोई समझौता तो नहीं होगा। यदि स्पेसिफिकेशन्स सही ढंग से परिभाषित नहीं किए गए, तो सामान की गुणवत्ता में उतार-चढ़ाव आ सकता है। साथ ही, ट्रांजिशन पीरियड के दौरान टेंडर प्रक्रिया में कुछ समय के लिए देरी होने की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता है।
