क्यों ₹1 करोड़ का लक्ष्य पड़ सकता है कम?
भारतीय परिवारों के लिए ₹1 करोड़ का एजुकेशन फंड बनाना एक आम लक्ष्य है, लेकिन शिक्षा की लगातार बढ़ती लागत इस लक्ष्य के लिए एक बड़ी चुनौती पेश कर रही है। असली मुश्किल सिर्फ बड़ी रकम जुटाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि यह पैसा भविष्य में शिक्षा के बढ़ते खर्चों को कवर कर सके।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत में शिक्षा की महंगाई (Education Inflation) आम महंगाई दर से कहीं ज़्यादा है। जहां आम उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के तहत शिक्षा की महंगाई दर लगभग 3.30% है, वहीं प्राइवेट संस्थानों और प्रोफेशनल कोर्सेस की फीस हर साल 8% से 12% तक तेज़ी से बढ़ सकती है। विदेश की बात करें तो यह दर 15% से 25% तक जा सकती है।
इसका सीधा मतलब है कि आज बनाया गया आपका सेविंग फंड, भविष्य की ज़रूरतों को पूरा करने में कम पड़ सकता है। उदाहरण के लिए, आज ₹10 लाख का कोई कोर्स 15 साल बाद 10-12% की महंगाई दर से ₹40-50 लाख का हो सकता है। इसी तरह, सिर्फ 5% सालाना महंगाई दर से भी 18 साल में ₹1 करोड़ का खर्च बढ़कर ₹2.41 करोड़ हो जाएगा। इस लिहाज़ से, ₹1 करोड़ का लक्ष्य महज़ एक सिम्बॉलिक (symbolic) लक्ष्य बनकर रह सकता है।
निवेश रिटर्न से ज़्यादा है शिक्षा महंगाई
पारंपरिक निवेश (Investment) विकल्प इन ऊंची महंगाई दरों से निपटने में संघर्ष कर रहे हैं। पब्लिक प्रोविडेंट फंड (PPF) जैसे सुरक्षित माने जाने वाले विकल्पों पर 7.1% का ब्याज मिलता है। लेकिन, 5-6% की औसत महंगाई दर को ध्यान में रखने पर, इसका वास्तविक रिटर्न (Real Return) घटकर महज़ 1-2% रह जाता है, जो सिर्फ महंगाई को मात देने के लिए काफी नहीं है।
सुकन्या समृद्धि योजना (SSY) जो बेटियों के लिए है, 8.2% ब्याज दर देती है। यह PPF से बेहतर है, लेकिन लंबी अवधि में यह भी लगातार बढ़ती शिक्षा महंगाई को मात देने में मुश्किल महसूस कर सकती है।
वहीं, इक्विटी म्यूचुअल फंड (Equity Mutual Funds), खासकर सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) के ज़रिए, लंबी अवधि में 11-15% तक का रिटर्न दे सकते हैं। 10 साल से ज़्यादा के समय में, इक्विटी फंड महंगाई से 5-8% का रियल रिटर्न देने में कामयाब रहे हैं। हालांकि, बाज़ार की अनिश्चितता (Market Volatility) एक जोखिम है, खासकर जब लक्ष्य की समय-सीमा नज़दीक आ रही हो।
विदेश में पढ़ाई का बढ़ता खर्च
विदेश में उच्च शिक्षा का सपना फंड जुटाने की चुनौती को और बढ़ा देता है। अमेरिका में सालाना ट्यूशन फीस और रहने का खर्च $25,000 से $55,000 (लगभग ₹16.50 लाख से ₹33.00 लाख प्रति वर्ष) तक जा सकता है। कनाडा जैसे देशों में भी यह ₹20-30 लाख प्रति वर्ष हो सकता है।
विदेश में शिक्षा महंगाई दर 15-25% रहने का अनुमान है। ऐसे में, जो फंड घरेलू पढ़ाई के लिए काफी लग रहा था, वह विदेश के लिए नाकाफी साबित हो सकता है।
इंश्योरेंस प्लान भी दे सकते हैं मात
चाइल्ड इंश्योरेंस प्लान (Child Insurance Plans) बीमा और निवेश का मिश्रण होते हैं, लेकिन ये अक्सर महंगाई से पिछड़ जाते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, गारंटीड प्लान 4-6% का रिटर्न दे पाते हैं, जो शिक्षा की बढ़ती लागत को पूरा करने के लिए कम है। मार्केट-लिंक्ड प्लान ज़्यादा रिटर्न दे सकते हैं, लेकिन उनमें लंबी लॉक-इन अवधि और बाज़ार का जोखिम भी होता है।
असली खतरा: भविष्य की पढ़ाई के लिए फंड की कमी
शिक्षा महंगाई और निवेश रिटर्न के बीच लगातार बनी रहने वाली खाई, भविष्य के शैक्षिक लक्ष्यों को अधूरा छोड़ने का बड़ा जोखिम पैदा करती है। ₹1 करोड़ जैसे एक फिक्स्ड (static) लक्ष्य को, महंगाई के कम्पाउंडिंग (compounding) प्रभाव पर विचार किए बिना, चुनने से एक बड़ी कमी रह सकती है।
माता-पिता को एक डायनामिक (dynamic) अप्रोच अपनाने की ज़रूरत है: भविष्य की लागत का अनुमान लगाएं, सही महंगाई दर को ध्यान में रखें और ऐसे निवेश चुनें जो सामान्य महंगाई दर से काफी ऊपर का रियल रिटर्न दे सकें, खासकर लंबी अवधि या विदेश में पढ़ाई के लक्ष्यों के लिए। वर्तमान योजनाएं बताती हैं कि भविष्य की कई शैक्षिक ज़रूरतों के लिए ₹1 करोड़ एक अपर्याप्त बेंचमार्क हो सकता है।
